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अघासुर का वधस्थल - जय कुण्ड

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अघासुर का वधस्थल - जय कुण्ड
       वृन्दावन के नजदीक हाइवे पर स्थित जैंत ग्राम, ब्रज के चौरासी कोस की परिक्रमा में आने वाला एक प्रमुख ग्राम है। यहाँ प्राचीन समय का जयकुंड स्थित है। कहा जाता है यही वो स्थान है जहाँ भगवान श्री कृष्ण को मारने के लिए कंस ने अघासुर नाम के दैत्य को भेजा था जो रिश्ते में पूतना राक्षसी का भाई भी था। अघासुर एक विशालकाय अजगर था जो इस इस स्थान पर आकर छुप गया और जब श्री कृष्ण गाय चराते हुए अपने ग्वाल वालों के साथ यहाँ पहुँचे तो अघासुर ने समस्त ग्वालवालों को निगलना शुरू कर दिया। भगवान श्री कृष्ण, अघासुर की इस चतुराई को समझ गए और अघासुर का निवाला बनने के लिए उसके सम्मुख आ गए। अघासुर ने बिना कोई पल गंवाए श्री कृष्ण को निगलना शुरू कर दिया। 

KALINGER FORT

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कालिंजर किले की तरफ एक सफर
सहयात्री - गंगा प्रसाद त्रिपाठी जी

       पिछली साल जब सासाराम गया था तब वहां मैंने शेरशाह सूरी के शानदार मकबरे को देखा था और वहीँ से मुझे यह जानकारी भी प्राप्त हुई थी कि उसने अपना यह शानदार मक़बरा अपने जीवनकाल के दौरान ही बनबा लिया था। सम्पूर्ण भारत पर जब मुग़ल साम्राज्य का वर्चस्व कायम हो रहा था उनदिनों मुग़ल सिंहासन पर हुमाँयु का शासनकाल चल रहा था और उन्हीं दिनों हूमाँयु के पिता और मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर ने बिहार में एक आम सैनिक को अपनी सेना में भर्ती किया, इस सैनिक की युद्ध नीति और कुशलता को देखते हुए बाबर ने इसे अपना सेनापति और बिहार का सूबेदार नियुक्त कर दिया था। तब बाबर ने यह सपने में भी नहीं सोचा था कि यही आम सैनिक आगे चलकर बाबर द्वारा स्थापित किये गए मुग़ल साम्राज्य को समाप्त कर अपना राज्य स्थापित करेगा और उसके बेटे हूमाँयु को हिंदुस्तान छोड़ने पर मजबूर कर देगा।

ALWAR FORT

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अलवर के ऐतिहासिक स्थल और बाला किला
      करीब 2 महीने पैर में चोट लगने और प्लास्टर चढ़ा रहने के कारण मैं कहीं की यात्रा करना तो दूर अपने घर से बाहर निकल भी नहीं पा रहा था, पर आज जब दो महीने बाद मुझे प्लास्टर से मुक्ति मिली तो मैं खुद को यात्रा पर जाने से नहीं रोक पाया। दीपावली निकल चुकी थी, पिछले दिनों अपनी ननिहाल आयराखेड़ा से लौटा था और आज जब शनिवार की छुट्टी हुई तो सर्दियों में सुबह की इस सुनहरी धुप में मैंने अपनी बाइक राजस्थान की तरफ दौड़ा दी। आज संग में जाने के लिए कोई भी सहयात्री मुझे अपने साथ नहीं मिला तो मैं अकेला ही रवाना हो गया।

FATEHPUR SIKARI

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फतेहपुर सीकरी और सलीम चिश्ती की दरग़ाह
पिछली यात्रा - लोहागढ़ दुर्ग 

     पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वी राजस्थान की सीमा पर स्थित आगरा शहर दुनियाभर में ताजमहल के कारण जाना जाता है परन्तु भारतीय इतिहास के अनुसार गौर किया जाये तो पता चलता है कि आगरा का अत्यधिक ऐतिहासिक महत्व मुग़ल सम्राट अक़बर की वजह से है जिन्होंने ना सिर्फ यहाँ एक मजबूत किले का निर्माण कराया बल्कि इसे अपनी राजधानी भी बनाया, साथ ही अपनी मृत्यु के बाद भी उन्होंने आगरा की ही धरती को पसंद किया और अपने मरने से पूर्व ही अपना मकबरा बनवा लिया। चूँकि आगरा शहर की स्थापना सिकंदर लोदी ने की थी परन्तु आगरा का मुख्य संस्थापक सम्राट अकबर को माना गया है।

LOHAGARH FORT

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लोहागढ़ दुर्ग की एक यात्रा
     मथुरा शहर से थोड़ी दूरी पर राजस्थान में भरतपुर शहर है जिसे लोहागढ़ के नाम से भी जाना जाता है, इसका प्रमुख कारण है यहाँ स्थित मजबूत दीवारों वाला किला जो हमेशा ही अजेय रहा। दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाला और हमेशा ही उनकी पहुँच दूर रहने के कारण ही इसे अजेय कहा जाता है। भरतपुर रियासत जाट राजाओं का प्रमुख गढ़ है और यहाँ बना हुआ यह किला उनकी सुरक्षा और विजय का मुख्य कारण रहा है। कहा जाता है इस किले की दीवारें लोहे के समान मजबूत हैं इसी वजह से इसे लोहागढ़ कहा जाता है। भरतपुर जाने वाली सरकारी बसें भी लोहागढ़ आगार के नाम से ही चलती हैं। अनेकों आक्रमण सहने के बाद भी यह किला आज भी अपनी उचित अवस्था में खड़ा हुआ है। भरतपुर को राजस्थान का पूर्वी सिंह द्धार  या प्रवेश द्धार भी कहा जाता है। 
     भरतपुर की स्थापना रुस्तम जाट द्वारा की गई थी, सन 1733 में महाराजा सूरजमल ने इस पर अधिकार कर लिया और नगर के चारों ओर एक सुरक्षित चारदीवारी का निर्माण करवाया। इसलिए भरतपुर का मुख्य संस्थापक महाराजा सूरजमल को माना जाता है और लोहागढ़ दुर्ग का निर्माणकर्ता भी। चूँकि भरतपुर का अधिकांश क्ष…

RANTHAMBHORE FORT

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रणथंभौर किला 

पिछली यात्रा - शिवाड़ दुर्ग और बारहवाँ ज्योतिर्लिंग 

      शिवाड़ से लौटने के बाद मैं सवाई माधोपुर स्टेशन पहुंचा और यहाँ से बाहर निकलकर मैंने तलाश की  रणथम्भौर जाने वाले किसी साधन की। एक दुकान पर मैंने अपनी शेव बनवाई और उसी दुकानदार से रणथम्भौर जाने वाली बस के बारे में पूछा तो दुकानदार ने थोड़ा आगे की तरफ इशारा करते हुए कहा कि वो सामने जीपें खड़ी हैं वही रणथम्भौर जाती हैं। मैं इन जीपों तक पहुँचा तो जीप वाले ने कहा जैसे ही कुछ सवारियाँ और आजायेंगी तभी हम चल पड़ेंगे। जबतक मैं अपनी प्रिय कोल्ड्रिंक थम्सअप लेने गया तब तक काफी सवारियां जीप वाले के पास आ चुकी थी। मैंने अपना बैग पहले ही जीप की आगे वाली सीट पर रख दिया था इसलिए वहां कोई नहीं बैठा और हम रवाना हो गए ऐतिहासिक महादुर्ग रणथम्भौर की ओर। 

SHIWAR

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शिवाड़ किला और घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग
       मानसून बीतता ही जा रहा था और इस वर्ष मेरी राजस्थान की यात्रा अभी भी अधूरी ही थी इसलिए पहले यात्रा के लिए उपयुक्त दिन निश्चित किया गया और फिर स्थान।  परन्तु इस बार मैं घर से ज्यादा दूर जाना नहीं चाहता था, बस यूँ समझ लीजिये मेरे पास समय का काफी अभाव था। यात्रा भी आवश्यक थी इसलिए इसबार रणथम्भौर जाने का प्लान बनाया मतलब सवाई माधोपुर की तरफ। यहाँ काफी ऐसी जगह थीं जो मेरे पर्यटन स्थलों की सैर की सूची में दर्ज थे। इसबार उनपर घूमने का समय आ चुका था इसलिए मैं रात को एक बजे घर से मथुरा स्टेशन के लिए निकल गया। बाइक को स्टैंड पर जमा कर मैं प्लेटफॉर्म पर पहुंचा। कुछ ही समय में निजामुद्दीन से तिरुवनंतपुरम जाने वाली एक एक्सप्रेस आ गई जिससे मैं सुबह पांच बजे सवाई माधोपुर पहुँच गया।

BATESHWAR TEMPLE

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बटेश्वर धाम - आगरा 
यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। 
       अब शाम करीब ही थी और मैं अभी भी आगरा से 72 किमी दूर बाह में ही था। नौगांवा किले से लौटने के बाद अब हम भदावर की प्राचीन राजधानी बाह में थे। मैंने सुना था कि यहाँ भी एक विशाल किला है परन्तु कहाँ है यह पता नहीं था। बस स्टैंड के पास पहुंचकर राजकुमार भाई को भूख लग आई पर उनका एक उसूल था कि वो जब तक मुझे कुछ नहीं खिलाएंगे खुद भी नहीं खाएंगे इसलिए मजबूरन मुझे भी कुछ न कुछ खाना ही पड़ता था। रक्षा बंधन का त्यौहार नजदीक था इसलिए मिठाइयों की दुकानें घेवरों से सजी हुई थीं। मैंने अपने लिए घेवर लिया और भाई ने वही पुरानी समोसा और कचौड़ी। दुकानदार से ही हमने किले के बारे में और बटेश्वर के लिए रास्ता पूछा। उसने हमें बाजार के अंदर से होकर जाती हुई एक सड़क की तरफ इशारा करते हुए कहा कि ये रास्ता सीधे बटेश्वर के लिए गया है इसी रास्ते पर आपको बाह का किला भी देखने को मिल जायेगा। 

NOUGANWA FORT

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नौगँवा किला - एक पुश्तैनी रियासत
पिछली यात्रा - पिनाहट किला 
     अटेर किला न जा पाने के कारण अब हमने बाह की तरफ अपना रुख किया। पिनाहट से एक रास्ता सीधे भिलावटी होते हुए बाह के लिए जाता है। इस क्षेत्र में अभी हाल ही में रेल सेवा शुरू हुई है जो आगरा से इटावा के लिए नया रेलमार्ग है। इस रेल लाइन का उद्घाटन भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेई के समय में हुआ था किन्तु कुछ साल केंद्र में विपक्ष की सरकार आने की वजह से इस रेल मार्ग को बनाने का काम अधूरा ही रहा। अभी हाल ही में ही रेल लाइन पर रेल सेवा शुरू हुई है। यह रेल मार्ग अब हमारे सामने था, जिसे पार करना हमें मुश्किल दिखाई दे रहा था। रेलवे लाइन के नीचे से सड़क एक पुलिया के जरिये निकलती है जिसमे अभी बहुत अत्यधिक ऊंचाई तक पानी भरा हुआ था इसलिए मजबूरन हमें बाइक पटरियों के ऊपर से उठाकर निकालनी  पड़ी और हम भिलावटी गांव पार करते हुए बाह के रेलवे स्टेशन पहुंचे। 

PINAHAT FORT

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चम्बल किनारे स्थित -  पिनाहट किला
    आज मेरा जन्मदिन था और आज सुबह से बारिश भी खूब अच्छी हो रही थी इसलिए आज मैं कहीं घूमने जाना चाहता था इसलिए मैंने भिंड में स्थित अटेर दुर्ग को देखने का प्लान बनाया। परन्तु मैं वहाँ अकेला नहीं जाना चाहता था इसलिए मैंने अपने साथ किसी मित्र को ले जाने के बारे में सोचा। आगरा में मेरे एक मित्र भाई है जिनका नाम है राजकुमार चौहान, मैंने आज कई सालों बाद उन्हें फोन किया तो मेरा फोन आने पर उन्हें कितनी ख़ुशी हुई ये मैं बयां नहीं कर सकता। उनके पास मेरा नंबर नहीं था और आगरा से मथुरा आने के बाद मैंने उनके पास कभी फोन नहीं किया, आज अचानक मेरा फोन आने से वो बहुत खुश हुए।