Showing posts with label MORENA. Show all posts
Showing posts with label MORENA. Show all posts

Friday, March 22, 2019

चौंसठ योगिनी - इकत्तरसो महादेव मंदिर

चौंसठ योगिनी - इकत्तरसो महादेव मंदिर 


      काकनमठ मंदिर की यात्रा करने के बाद अब हमारा अगला लक्ष्य था मुरैना के मितावली स्थित इकत्तरसो महादेव मंदिर को देखना जो चौंसठ योगिनी मंदिर में से एक है तथा इसकी संरचना के आधार पर ही आज हमारे देश की संसद भवन का निर्माण हुआ है। यह मंदिर काकनमठ से दूर पूर्व - दक्षिण दिशा में करीब 20 किमी दूर स्थित है। यहाँ जाने के लिए सबसे पहले हम सिहोनिया वापस लौटे और सिहोनिया से ख़राब से दिखने वाले एक वीरान रास्ते पर चल पड़े। होली का समय था इसलिए रास्तों में आने वाले गाँवों में ग्रामवासी रास्तों में होली खेल रहे थे, इनसे बाल बाल बचते हुए हम अपनी मंजिल  तरफ बढ़ते ही रहे। 

     कुछ दूर पहुँचने के बाद हमें एक चम्बल नदी की कैनाल दिखाई दी, जिसके किनारे किनारे 2  से 3 किमी चलने  के बाद मितावली के लिए एक रास्ता जाता मिला। हम कुछ देर इस कैनाल किनारे खड़े रहे और इसमें हाथ मुँह धोकर बढ़े। मितावली से कुछ दूर पहले ही खेतों के बीचों बीच एक गोलाकार आकृति में एक पहाड़ी दिखाई दी  इसके नजदीक पहुंचे तो जाना कि यही चौंसठ योगिनी का इकत्तरसो महादेव मंदिर है। यहाँ पुरातत्व विभाग ने काफी अच्छा संरक्षण किया हुआ है। हमने अपनी बाइक एक किनारे खड़ी की और मंदिर की तरफ बढ़ चले। मंदिर एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है  जिस पर जाने के लिए यहाँ सीढ़ीयां बनी हुईं थीं। 

     माना जाता है यह स्थान अति प्राचीन ऐतिहासिक कालीन स्थान है। पुरातत्व विभाग की खोजबीन की रिपोर्ट  अनुसार कुषाणकालीन राजा कनिष्क के समय में  का विशेष महत्व था, हालाँकि कनिष्क बौद्ध धर्म का अनुयायी था परन्तु हो सकता है उससे पहले के कुषाणकालीन वंशजों या बाद के वंशजों ने इस स्थान को विशेष महत्व दिया हो क्योंकि इस पहाड़ की तलहटी में पुरातत्व विभाग को कुषाणकालीन आभूषणों से युक्त अनेकों प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं जो आज भी ग्वालियर किले के संग्रहालय में सुरक्षित हैं साथ ही यह भी सिद्ध करती हैं कुषाणों के समय में यह स्थान कोई साधारण स्थान नहीं रहा होगा। 

      विशाल दीवार की गोलाई में बना यह मंदिर अपने आप में शिल्प कला  एकमात्र अनूठा उदहारण है  भारतवर्ष में अत्यंत्र कहीं भी देखने को नहीं मिला। भारत की संसद भवन की सरंचना इसी मंदिर की संरचना के आधार पर की गई है। मंदिर के अंदर प्रवेश करने पर पता चलता है कि इसके अंदर वृत्ताकार रूप छोटे छोटे चौंसठ शिव मंदिर बने हुए हैं जिसकारण इसे चौसठ योगिनी मंदिर भी कहा जाता है। कहते हैं इसका निर्माण महाराजा देवपाल ने 1323 ई. में कराया था। 

     विमल को स्थान कुछ खास पसंद नहीं आया परन्तु ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह कितना महत्वपूर्ण यह मैं तरह से जानता था परन्तु विमल को यह समझाना अत्यंत ही कठिन था क्योंकि वो आज मतलब वर्तमान जीने वाला इंसान है और ऐसी ऐतिहासिक जगहें उसके लिए कोई मायने नहीं रखती थीं। आज मेरी वजह से वो इन पत्थरों में तप रहा था और अत्यधिक बैचैन भी था क्योंकि मैं आज उसे उसके घर से इतनी दूर जो ले आया था वो बाइक से जबकि वो एक ऐसा इंसान है जो बाइक से कभी आगरा से बाहर निकला भी नहीं था। उसे डर था कि कहीं रास्ते में कोई पकड़ ले या बाइक ही ख़राब हो जाए तो वो क्या करेगा ? उसका कहीं तक सोचना भी उचित भी था क्योंकि हम इसवक्त अपने शहर अपने राज्य से दूर चम्बल के किनारे थे जिसके नाम से ही मन में अजीब सा डर बैठने लगता है। 

रास्ते में एक गाँव 

चम्बल नहर 

चम्बल नहर के किनारे दो यात्री 

आगे का रास्ता 

चम्बल नहर 

नहर किनारे विमल 

और मैं भी 

एक पुराना मंदिर 

दूर दिखाई देता चौसठ योगिनी 


मितावली में प्रवेश 

मंदिर का द्धार 

 बाइक लगाकर आये दो दोस्त 

मंदिर तक जाने के लिए ऊँची सीढ़ीयां 


लोकेश, चढ़ने के बाद 


चौसठ योगिनी - एकत्तरसे महादेव 

मंदिर का वृत्ताकार रूप 

विमल आराम फरमाते हुए 

जय महादेव बाबा 

मंदिर के बाहर 

पुरातत्व की अभी भी जारी है 


संसद भवन इसी शैली में निर्मित है 

मितावली ग्राम का एक दृश्य 

मैं और विमल 

इस बैल की भी कोई ना कोई अवश्य होगी - पर यहाँ बताने वाला कोई नहीं था 


श्री राम मंदिर 
          धन्यवाद 

 अगले भाग में जारी ...... 

मैं काकनमठ हूँ

मैं काकनमठ हूँ 



      चम्बल नदी के आसपास के बीहड़ों में प्राचीनकाल से ही मानवों का बसेरा रहा है चाहे ये बीहड़ देखने में कितने  भयावह क्यों ना लगें परन्तु मनुष्य एक ऐसी प्रजाति है जो धरती के  किसी भी भाग में अपने जीवन यापन की राह ढूंढ ही लेता है। सदियों से चम्बल के बीहड़ों में अनेकों सभ्यताओं का जन्म हुआ, अनेकों शासकों ने अपने किले, अपने महल और अपने राज्य यहाँ स्थापित किये और भारतीय इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ने और आने वाली पीढ़ियों को अपने वजूद, अपने काल और अपनी संस्कृति का सन्देश देने के लिए अनेकों मंदिरों, भवनों और इमारतों का निर्माण कराया। इन्हीं वंशों में एक काल था कछवाहा वंश के राजाओं का, जिन्होंने चम्बल के दूसरी तरफ एक विशाल राज्य का निर्माण किया और अनेकों मंदिरों का निर्माण कराया। गुजरते हुए वक़्त के साथ राजा, उनकी सेना और उनका राज्य समाप्त हो गया किन्तु उनके बनवाये हुए मंदिर और इमारतें आज भी उनकी बेजोड़ स्थापत्य कला का उदाहरण बनकर जीवित हैं। 

     मथुरा से 70 किमी दूर दक्षिण दिशा में चम्बल नदी पार करते ही मध्य प्रदेश की सीमा शुरू हो जाती है और मुरैना इस राज्य पहला जिला पड़ता है। 11 वीं शताब्दी में मुरैना कछवाहा वंश की राजधानी रहा है जिसका केंद्र मुरैना से 23 किमी पूर्व की ओर सिहोनियां था। सिहोनिया ही कछवाहा वंश की राजधानी था जहाँ 11 वीं शताब्दी में राजा कीर्तिराज ने अपनी रानी काकनवती की ईच्छा पूर्ति के लिए एक शिव मंदिर का निर्माण कराया जिसका नाम उन्होंने रानी के नाम पर ही काकनमठ रखा। खुजराहो के मंदिर शैली में बना यह मंदिर 115 फ़ीट ऊँचा है जिसे बनाने में किसी भी तरह के चूने या अन्य मसाले का इस्तेमाल नहीं हुआ है। आज एक हजार साल बाद भी यह मंदिर अनेकों प्राकतिक आपदा और वक़्त की मार को सहते हुए भी अजेय खड़ा है। 

     भारत की इस अनमोल धरोहर को देखने के लिए मैं अपनी बाइक लेकर मुरैना की तरफ रवाना हो गया। आगरा पहुँच कर मेरे दो बचपन के मित्र विमल और लोकेश भी अपनी बाइक पर मेरे साथ इस ऐतिहासिक सफर पर चल पड़े और कुछ ही समय बाद हम तीनों मित्र चम्बल पार करके मुरैना पहुँचे। यहाँ से भिंड की तरफ जाने वाले रास्ते पर कुछ दूर चलने के बाद सिहोनिया जाने वाला रास्ता हमें मिला और जब 5 - 6 किमी आगे बढे तो दूर खेतों के बीचों बीच एक पत्थरों से सटा हुआ कंकाल जैसा दिखने वाला एक भग्नावेश हमें दिखाई दिया। इसे देखते ही मुझे पहचानने में देर नहीं लगी कि यही काकनमठ मंदिर है परन्तु इसके करीब जाने वाला रास्ता अभी हम से दूर था। 

      रास्ते में एक गाँव आया जहाँ कुछ देर रूककर हमने थम्सअप पी क्योंकि बचपन के ये दोस्त आज कई सालों बाद मिले थे और जब से मिले थे तब से सफर लगातार जारी था, पानी पीने का भी समय तक हमें नहीं मिल पाया था। अब जब मंजिल सामने थी तो फिर जल्दी कैसी, नीम के पेड़ की छाँव में ठंडी कोल्ड्रिंक के हम एक के बाद एक घूँट मारे जा रहे थे। कोल्ड्रिंक पीने के बाद मैंने दुकानदार से ही मंदिर तक जाने का रास्ता पूछा तो उसने  आगे की तरफ इशारा करते हुए बताया कि इसके बाद आपको एक गाँव और मिलेगा और उस गाँव को पार करते ही मंदिर के लिए रास्ता भी मिल जाएगा। 

     हम दूकानदार के बताये रास्ते पर चल पड़े और जल्द ही उस गाँव में पहुँचे जिसके बाद काकनमठ के लिए रास्ता जाता है। यह गाँव सिहोनिया था और 11 वीं शताब्दी में कछवाहा राजाओं की राजधानी हुआ करता था। यहाँ अब कोई भी ऐतिहासिक स्थल मौजूद नहीं था जो यह सिद्ध करता कि प्राचीनकाल में यह किसी साम्राज्य की राजधानी था जिसका मुख्य कारण था इसका चम्बल नदी के नजदीक स्थित होना। अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ की सभ्यता को समाप्त हुए 1000 साल भी ज्यादा समय बीत चुका है और इतने समय के अंतराल में यहाँ स्थित चम्बल नदी में बाढ़ का आना लाजमी है जिसने हो सकता है इस साम्राज्य को समाप्त कर दिया हो। अब यहाँ कुछ बचा था तो सिर्फ इस राजधानी का नाम सिहोनिया, जिसके नाम पर आज यहाँ आधुनिक गाँव स्थित है और काकनमठ मंदिर, जो अपनी बेजोड़ स्थापत्य कला की वजह से अनेकों आपदाएँ सहकर भी जीवित है। 

     जब हम मंदिर में पहुँचे तो मंदिर के चारों तरफ फैले हुए इस मंदिर के अवशेष चीख चीख कर कह रहे थे कि अपने समय में यह मंदिर कितना विशाल रहा होगा। जितने पत्थर इस मंदिर में लगे हुए थे उससे कही ज्यादा इसके चारों तरफ बिखरे हुए पड़े थे जिन्हे पुरातत्व विभाग ने मंदिर की चारदीवारी के चारों तरफ सुसज्जित रखा है। आज काकनमठ देखने में मंदिरों के कंकाल की भाँति प्रतीत होता है किन्तु आज भी बिना किसी जोड़ के यह मंदिर अपनी पूर्ण अवस्था में खड़ा है और हमारे हिंदू धर्म के आराध्य भगवान शंकर की छत्र छाया बना हुआ है। 

    जैन धर्म के प्रवर्तकों ने इस मंदिर में जैन तीर्थकरों की प्रतिमाओं को स्थापित किया जिसमे शांतिनाथ, आदिनाथ,पार्श्वनाथ आदि प्रमुख हैं और इस मंदिर को जैन मंदिर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी परन्तु जब आखिरकार हिन्दू धर्म अनेकों धर्मयुद्ध जीतकर वापस अपनी पुनःअवस्था में लौटा तो ये मंदिर भी पुनः हिंदू धर्म के मंदिर के रूप तब्दील हो गया।