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Friday, March 22, 2019

पढ़ावली - दशवीं शताब्दी का एक खंडित शिव मंदिर

पढ़ावली - दशवीं शताब्दी का एक खंडित शिव मंदिर 


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     मितावली से ही कुछ दूर ऊँची ऊँची पहाड़ियाँ सी दिखने लगी थीं। किसी ने हमें बताया कि उन पहाड़ियों के उसपार ग्वालियर की सीमा शुरू हो जाती है और मुरैना की समाप्त।  ये सुनते ही विमल मुझपर झर्राया - तू हमें आखिर धीरे धीरे करके ग्वालियर तक ले ही आया, अब बहुत हो चुका अब सीधे घर का रास्ता पकड़ते हैं। मैं जानता था अभी यहाँ बहुत ऐसा है जिसे ढूँढना और देखना बाकी था और मैं किसी भी हालत में इस खोज को अधूरा छोड़कर जाने वाला नहीं था परन्तु अपने दोस्त को विश्वास दिलाना और उसकी चिंता समाप्त करना भी मेरा ही कर्तव्य था, इसलिए मैंने उसे गूगल में हाईवे तक पहुँचने का रास्ता दिखाया जो ठीक उन पहाड़ियों के बराबर से हाईवे तक जा रहा था। घर की तरफ जाने वाले रास्ते को देखकर विमल संतुष्ट हो गया और उसे यकीन हो गया कि हम घर की तरफ ही बढ़ रहे हैं बस रास्ते में जो भी ऐसी जगह मिलेगी उसे देखते हुए जायेंगे। 

      कुछ ही समय में हम उन पहाड़ियों के करीब पहुँचे जहाँ बटेश्वर मंदिर समूह की ओर जाने वाले रास्ते पर हमें एक गांव मिला जिसका नाम था 'पढ़ावली' और यहीं हमें देखने को मिला एक किले की तरह दिखने वाला  ऐतिहासिक कालीन स्थान जिसे गढ़ी पढ़ावली के नाम से जाना जाता है। यहाँ पुरातत्व विभाग ने काफी अच्छी देख रेख की हुई है। किले की तरह दिखने वाली इस गढ़ी का गेट किसी राजमहल के गेट से कम नहीं लगता। मुख्य द्धार के दोनों तरफ बड़ी बड़ी घोड़ों की प्रतिमाएं और इसकी मजबूत दीवारें दर्शाती हैं कि यह वाकई अपने समय में कितना विशाल रहा होगा। यहाँ आने से पहले मुझे इस स्थान की कोई भी जानकारी नहीं थी और नाही इस स्थान के इतिहास के बारे में मुझे कोई यहाँ ठीक से बता पाया। परन्तु पुरातत्व विभाग द्वारा पत्थर का बोर्ड जरूर बाहर लगा हुआ था जिसे मैंने गौर से पढ़ा और जाना कि यह भी 10 वीं शताब्दी का पुराना शिव मंदिर है जिसे गोहद के जाट राजाओं ने एक किलेनुमा गढ़ी के रूप में परिवर्तित कर दिया है। 

     पत्थर के बोर्ड से मिली जानकारी के आधार पर मुझे इसे देखने की उत्सुकुता और बढ़ गई परन्तु इस बीच मेरे दोनों दोस्तों की रूचि यहाँ आकर समाप्त हो गई वे दोनों इस गढ़ी के बाहर नीम के पेड़ छाया में आराम करने लगे। मैं अकेला ही गढ़ी के अंदर गया और इसके मुख्य मंडप के नीचे पहुँचा जिसकी दीवारों पर बनी हुई पत्थरोँ की मूर्तियां और छत के अंदर की गई चित्रकारी अतुलनीय है। मंडप के ठीक सामने टूटे फूटे पत्थरों से बनी हुई खंडित मूर्तियों का अंबार लगा हुआ था और ठीक चारों तरफ की दीवारों पर हिन्दू देवी देवताओं की खंडित मूर्तियां आसन पर आसीन थीं। मुझे जिसकी तलाश थी वो अभी तक मुझे कहीं भी दिखाई नहीं दिया और वो था वो शिव मंदिर जिसे सुरक्षित करने के लिए इस गढ़ी का निर्माण हुआ था। 

     मैं इस गढ़ी के गुप्त मार्गों को खोजता हुआ आखिरकार शिवमंदिर के उस शिवलिंग तक पहुँच ही गया जो बड़ी ही क्रूरता के साथ खंडित किया गया था और जिसे विदेशी आक्रांताओं के जुल्म से बचाने के लिए एक कोने में छुपा दिया गया था किन्तु इन विदेशी आक्रांताओं के सैनिकों की दृष्टि से ये यहाँ भी नहीं बच सका और इसे नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। इसके ठीक बराबर में अपने मूलरूप में एक शिवलिंग और मैंने देखा जो खंडित तो नहीं था परन्तु अपने मूल स्थान पर भी नहीं था और एक कोने में ही पड़ा हुआ था जिसे देखकर लगता है मानो इसका निर्माण भी उसी समय हुआ होगा जब इस गढ़ी का निर्माण हुआ था। हिन्दुओं के आराध्य भगवान शिव जिनका किसी समय में इस स्थान पर भव्य दुग्धाभिषेक और पूजा अर्चना होती होगी आज  ऐतिहासिक कालीन मंदिर में ऐसी दुर्दशा देखकर मेरा मन विचलित हो उठा और इस स्थान के इतिहास की कल्पना करते हुए  दोस्तों के पास बाहर आ गया। 

    
गढ़ी पढ़ावली 

 गढ़ी पढ़ावली में सुधीर उपाध्याय 

गढ़ी पढ़ावली 

गढ़ी पढ़ावली का वर्णन 

मेरा मित्र - लोकेश ( मैं नहीं जाऊँगा अंदर, तुम ही देख आओ ) 

गढ़ी पढ़ावली 

गढ़ी पढ़ावली प्रवेश द्धार 

प्रवेश द्धार के पास एक प्रतिमा 

मंडप 

मंडप और शानदार कारीगरी 

गुप्त मार्ग 

मंडप 

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ये नया शिवलिंग है शायद 

और ये शायद पुराना शिवलिंग है जो मूल शिवलिंग रहा होगा, साथ ही नंदी की खंडित मूर्ति  






बटेश्वर की तरफ जाने वाला रास्ता 

हिन्दू देवी देवताओं की आसीन प्रतिमाएँ 

नीम के पेड़ की छाया में मेरा इंतजार करते विमल और लोकेश, ये हरी बोतल वाला कोई अन्य है 


विमल की घर जाने की ख़ुशी और जल्दी

धन्यवाद 

चौंसठ योगिनी - इकत्तरसो महादेव मंदिर

चौंसठ योगिनी - इकत्तरसो महादेव मंदिर 


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      काकनमठ मंदिर की यात्रा करने के बाद अब हमारा अगला लक्ष्य था मुरैना के मितावली स्थित इकत्तरसो महादेव मंदिर को देखना जो चौंसठ योगिनी मंदिर में से एक है तथा इसकी संरचना के आधार पर ही आज हमारे देश की संसद भवन का निर्माण हुआ है। यह मंदिर काकनमठ से दूर पूर्व - दक्षिण दिशा में करीब 20 किमी दूर स्थित है। यहाँ जाने के लिए सबसे पहले हम सिहोनिया वापस लौटे और सिहोनिया से ख़राब से दिखने वाले एक वीरान रास्ते पर चल पड़े। होली का समय था इसलिए रास्तों में आने वाले गाँवों में ग्रामवासी रास्तों में होली खेल रहे थे, इनसे बाल बाल बचते हुए हम अपनी मंजिल  तरफ बढ़ते ही रहे। 

     कुछ दूर पहुँचने के बाद हमें एक चम्बल नदी की कैनाल दिखाई दी, जिसके किनारे किनारे 2 से 3 किमी चलने के बाद मितावली के लिए एक रास्ता जाता मिला। हम कुछ देर इस कैनाल के किनारे खड़े रहे और इसमें हाथ मुँह धोकर बढ़े। मितावली से कुछ दूर पहले ही खेतों के बीचों बीच एक गोलाकार आकृति में एक पहाड़ी दिखाई दी  इसके नजदीक पहुंचे तो जाना कि यही चौंसठ योगिनी का इकत्तरसो महादेव मंदिर है। यहाँ पुरातत्व विभाग ने काफी अच्छा संरक्षण किया हुआ है। हमने अपनी बाइक एक किनारे खड़ी की और मंदिर की तरफ बढ़ चले। मंदिर एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है जिस पर जाने के लिए यहाँ सीढ़ीयां बनी हुईं थीं। 

     माना जाता है यह स्थान अति प्राचीन ऐतिहासिक कालीन स्थान है। पुरातत्व विभाग की खोजबीन की रिपोर्ट अनुसार कुषाणकालीन राजा कनिष्क के समय में इस स्थान का विशेष महत्व था, हालाँकि कनिष्क बौद्ध धर्म का अनुयायी था परन्तु हो सकता है उससे पहले के कुषाणकालीन वंशजों या बाद के वंशजों ने इस स्थान को विशेष महत्व दिया हो क्योंकि इस पहाड़ की तलहटी में पुरातत्व विभाग को कुषाणकालीन आभूषणों से युक्त अनेकों प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं जो आज भी ग्वालियर किले के संग्रहालय में सुरक्षित हैं साथ ही यह भी सिद्ध करती हैं कुषाणों के समय में यह स्थान कोई साधारण स्थान नहीं रहा होगा। 

      विशाल दीवार की गोलाई में बना यह मंदिर अपने आप में शिल्प कला का एकमात्र अनूठा उदहारण है जो मुझे भारतवर्ष में अत्यंत्र कहीं भी देखने को नहीं मिला। भारत की संसद भवन की सरंचना इसी मंदिर की संरचना के आधार पर की गई है। मंदिर के अंदर प्रवेश करने पर पता चलता है कि इसके अंदर वृत्ताकार रूप छोटे छोटे चौंसठ शिव मंदिर बने हुए हैं जिसकारण इसे चौसठ योगिनी मंदिर भी कहा जाता है। कहते हैं इसका निर्माण महाराजा देवपाल ने 1323 ई. में कराया था। 

     विमल को स्थान कुछ खास पसंद नहीं आया परन्तु ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह कितना महत्वपूर्ण यह मैं तरह से जानता था परन्तु विमल को यह समझाना अत्यंत ही कठिन था क्योंकि वो आज मतलब वर्तमान जीने वाला इंसान है और ऐसी ऐतिहासिक जगहें उसके लिए कोई मायने नहीं रखती थीं। आज मेरी वजह से वो इन पत्थरों में तप रहा था और अत्यधिक बैचैन भी था क्योंकि मैं आज उसे उसके घर से इतनी दूर जो ले आया था वो बाइक से जबकि वो एक ऐसा इंसान है जो बाइक से कभी आगरा से बाहर निकला भी नहीं था। उसे डर था कि कहीं रास्ते में कोई पकड़ ले या बाइक ही ख़राब हो जाए तो वो क्या करेगा ? उसका कहीं तक सोचना भी उचित भी था क्योंकि हम इसवक्त अपने शहर अपने राज्य से दूर चम्बल के किनारे थे जिसके नाम से ही मन में अजीब सा डर बैठने लगता है। 

रास्ते में एक गाँव 

चम्बल नहर 

चम्बल नहर के किनारे दो यात्री 

आगे का रास्ता 

चम्बल नहर 

नहर किनारे विमल 

और मैं भी 

एक पुराना मंदिर 

दूर दिखाई देता चौसठ योगिनी 


मितावली में प्रवेश 

मंदिर का द्धार 

 बाइक लगाकर आये दो दोस्त 

मंदिर तक जाने के लिए ऊँची सीढ़ीयां 


लोकेश, चढ़ने के बाद 


चौसठ योगिनी - एकत्तरसे महादेव 

मंदिर का वृत्ताकार रूप 

विमल आराम फरमाते हुए 

जय महादेव बाबा 

मंदिर के बाहर 

पुरातत्व की अभी भी जारी है 


संसद भवन इसी शैली में निर्मित है 

मितावली ग्राम का एक दृश्य 

मैं और विमल 

इस बैल की भी कोई ना कोई अवश्य होगी - पर यहाँ बताने वाला कोई नहीं था 


श्री राम मंदिर 
          धन्यवाद