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ALWAR FORT

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अलवर के ऐतिहासिक स्थल और बाला किला
      करीब 2 महीने पैर में चोट लगने और प्लास्टर चढ़ा रहने के कारण मैं कहीं की यात्रा करना तो दूर अपने घर से बाहर निकल भी नहीं पा रहा था, पर आज जब दो महीने बाद मुझे प्लास्टर से मुक्ति मिली तो मैं खुद को यात्रा पर जाने से नहीं रोक पाया। दीपावली निकल चुकी थी, पिछले दिनों अपनी ननिहाल आयराखेड़ा से लौटा था और आज जब शनिवार की छुट्टी हुई तो सर्दियों में सुबह की इस सुनहरी धुप में मैंने अपनी बाइक राजस्थान की तरफ दौड़ा दी। आज संग में जाने के लिए कोई भी सहयात्री मुझे अपने साथ नहीं मिला तो मैं अकेला ही रवाना हो गया।

LOHAGARH FORT

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लोहागढ़ दुर्ग की एक यात्रा
     मथुरा शहर से थोड़ी दूरी पर राजस्थान में भरतपुर शहर है जिसे लोहागढ़ के नाम से भी जाना जाता है, इसका प्रमुख कारण है यहाँ स्थित मजबूत दीवारों वाला किला जो हमेशा ही अजेय रहा। दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाला और हमेशा ही उनकी पहुँच दूर रहने के कारण ही इसे अजेय कहा जाता है। भरतपुर रियासत जाट राजाओं का प्रमुख गढ़ है और यहाँ बना हुआ यह किला उनकी सुरक्षा और विजय का मुख्य कारण रहा है। कहा जाता है इस किले की दीवारें लोहे के समान मजबूत हैं इसी वजह से इसे लोहागढ़ कहा जाता है। भरतपुर जाने वाली सरकारी बसें भी लोहागढ़ आगार के नाम से ही चलती हैं। अनेकों आक्रमण सहने के बाद भी यह किला आज भी अपनी उचित अवस्था में खड़ा हुआ है। भरतपुर को राजस्थान का पूर्वी सिंह द्धार  या प्रवेश द्धार भी कहा जाता है। 
     भरतपुर की स्थापना रुस्तम जाट द्वारा की गई थी, सन 1733 में महाराजा सूरजमल ने इस पर अधिकार कर लिया और नगर के चारों ओर एक सुरक्षित चारदीवारी का निर्माण करवाया। इसलिए भरतपुर का मुख्य संस्थापक महाराजा सूरजमल को माना जाता है और लोहागढ़ दुर्ग का निर्माणकर्ता भी। चूँकि भरतपुर का अधिकांश क्ष…

RANTHAMBHORE FORT

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रणथंभौर किला 

पिछली यात्रा - शिवाड़ दुर्ग और बारहवाँ ज्योतिर्लिंग 

      शिवाड़ से लौटने के बाद मैं सवाई माधोपुर स्टेशन पहुंचा और यहाँ से बाहर निकलकर मैंने तलाश की  रणथम्भौर जाने वाले किसी साधन की। एक दुकान पर मैंने अपनी शेव बनवाई और उसी दुकानदार से रणथम्भौर जाने वाली बस के बारे में पूछा तो दुकानदार ने थोड़ा आगे की तरफ इशारा करते हुए कहा कि वो सामने जीपें खड़ी हैं वही रणथम्भौर जाती हैं। मैं इन जीपों तक पहुँचा तो जीप वाले ने कहा जैसे ही कुछ सवारियाँ और आजायेंगी तभी हम चल पड़ेंगे। जबतक मैं अपनी प्रिय कोल्ड्रिंक थम्सअप लेने गया तब तक काफी सवारियां जीप वाले के पास आ चुकी थी। मैंने अपना बैग पहले ही जीप की आगे वाली सीट पर रख दिया था इसलिए वहां कोई नहीं बैठा और हम रवाना हो गए ऐतिहासिक महादुर्ग रणथम्भौर की ओर। 

SHIWAR

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शिवाड़ किला और घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग
       मानसून बीतता ही जा रहा था और इस वर्ष मेरी राजस्थान की यात्रा अभी भी अधूरी ही थी इसलिए पहले यात्रा के लिए उपयुक्त दिन निश्चित किया गया और फिर स्थान।  परन्तु इस बार मैं घर से ज्यादा दूर जाना नहीं चाहता था, बस यूँ समझ लीजिये मेरे पास समय का काफी अभाव था। यात्रा भी आवश्यक थी इसलिए इसबार रणथम्भौर जाने का प्लान बनाया मतलब सवाई माधोपुर की तरफ। यहाँ काफी ऐसी जगह थीं जो मेरे पर्यटन स्थलों की सैर की सूची में दर्ज थे। इसबार उनपर घूमने का समय आ चुका था इसलिए मैं रात को एक बजे घर से मथुरा स्टेशन के लिए निकल गया। बाइक को स्टैंड पर जमा कर मैं प्लेटफॉर्म पर पहुंचा। कुछ ही समय में निजामुद्दीन से तिरुवनंतपुरम जाने वाली एक एक्सप्रेस आ गई जिससे मैं सुबह पांच बजे सवाई माधोपुर पहुँच गया।

BHANGARH

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भानगढ़ - प्रसिद्ध हॉन्टेड पैलेस 
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     अजबगढ़ से निकलते ही शाम हो चली थी, घडी इसवक्त चार बजा रही थी और अभी भी हम भानगढ़ किले से काफी दूर थे।  सुना है इस किले में सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के पश्चात प्रवेश करना वर्जित है। अर्थात हमें यह किला दो घंटे के अंदर घूमकर वापस लौटना था। मैंने सोचा था कि भानगढ़ किला भी अजबगढ़ की तरह वीरान और डरावना सा प्रतीत होता होगा परन्तु जब यहाँ आकर देखा तो पता चला कि इस किले को देखने वाले हम ही अकेले नहीं थे, आज रविवार था और दूर दूर से लोग यहाँ इस किले को देखने आये हुए थे। किले तक पहुँचने वाले रास्ते पर इतना जाम था कि लग रहा था कि हम किसी किले की तरफ नहीं बल्कि किसी बिजी रास्ते पर हों।

AJABGARH FORT

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अजबगढ़ की ओर 
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     नारायणी मंदिर से निकलते ही मौसम काफी सुहावना हो चला था। आसमान में बादलों की काली घटायें छाई हुईं थीं। बादल इसकदर पहाड़ों को थक लेते थे कि उन्हें देखने से ऐसा लगा रहा था जैसे हम अरावली की वादियों में नहीं बल्कि हिमालय की वादियों में आ गए हों। घुमावदार पहाड़ी रास्तों पर बाइक अपने पूरे वेग से दौड़ रही थी, यहाँ से आगे एक चौराहा मिला जहाँ से एक रास्ता भानगढ़ किले की तरफ जाता है और सामने की ओर सीधे अजबगढ़,  जो यहाँ से अभी आठ किमी दूर था। 

NARAYANI DHAM

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नारायणी माता मंदिर - नारायणी धाम
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    टहला से अजबगढ़ जाते समय हम एक ऐसे स्थान पर आकर रुके जहाँ चारों और घने पीपल के वृक्ष थे, यह एक चौराहा था जहाँ से एक रास्ता नारायणी माता के मंदिर के लिए जाता है जो यहाँ से कुछ ही किमी दूर है। हमने सोचा जब ट्रिप पर निकले ही हैं तो क्यों ना माता के दर्शन कर लिए जाएँ और यही सोचकर हम नारायणी धाम की तरफ रवाना हो गए। यहाँ अधिकतर लोग लोकल राजस्थानी ही थे और इन लोगों में नारायणी माता की बड़ी मान्यता है। आज यहाँ मेला लगा हुआ था, काफी भीड़ भी थी और तरह तरह की दुकाने भी लगी हुईं थी।

TAHALA FORT

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टहला किला का एक दृशय 
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     कुम्हेर का किला देखने के बाद हमने मोबाइल में आगे का रास्ता देखा, इस वक़्त हम भरतपुर से डीग स्टेट हाईवे पर खड़े थे, यहाँ से कुछ आगे एक रास्ता सिनसिनी, जनूथर होते हुए सीधे नगर को जाता है, जोकि शॉर्टकट है अन्यथा हाईवे द्वारा डीग होकर नगर जाना पड़ता, जो की लम्बा रास्ता है। हम सिनसिनी की तरफ रवाना हो लिए और जनूथर पहुंचे, जनूथर से नगर 22 किमी है। नगर पहुंचकर हम बस स्टैंड पर जाकर रुक गए। यहाँ हमने गर्मागरम जलेबा खाये।  

KUMHER FORT

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कुबेर नगरी - कुम्हेर 

       अबकी बार मानसून इतनी जल्दी आ गया कि पता ही नहीं चला, पिछले मानसून में जब राजस्थान में बयाना और वैर की मानसून की यात्रा पर गया था, और उसके बाद मुंबई की यात्रा पर, ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो। वक़्त का कुछ पता नहीं चलता, जब जिंदगी सुखमय हो तो जल्दी बीत जाता है और गर दिन दुखमय हों तो यही वक़्त कटे नहीं कटता है। खैर अब जो भी हो साल बीत चुका है और फिर मानसून आ गया है, और मानसून को देखकर मेरा मन राजस्थान जाने के लिए व्याकुल हो उठता है। इसलिए अबकी बार भानगढ़ किले की ओर अपना रुख है, उदय के साथ एक बार फिर बाइक यात्रा।
        आज रविवार था, मैं और उदय कंपनी से छुट्टी लेकर सुबह ही मथुरा से राजस्थान की तरफ निकल लिए और सौंख होते हुए सीधे राजस्थान में कुबेर नगरी कुम्हेर पहुंचे। यह मथुरा से 40 किमी दूर भरतपुर जिले में है। कहा जाता है कि यह नगरी देवताओं में धन के देवता कुबेर ने बसाई थी, वही कुबेर जो रावण के सौतेले भाई थे। यहाँ एक विशाल किला है जो नगर में घुसते ही दूर से दिखाई देता है। भानगढ़ की तरफ जाते हुए सबसे पहले हम इसी किले को देखने के लिए गए। किले के मुख्य रास्ते स…

DWARIKA EXPRESS

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द्धारिका यात्रा 
पहला पड़ाव - जयपुर 
     चार धामों में से एक और सप्तपुरियों में से भी एक भगवान श्री कृष्ण की पावन नगरी द्धारिका की यह मेरी पहली यात्रा थी जिसमे मेरे साथ मेरी माँ, मेरी छोटी बहिन निधि, मेरी बुआजी बीना और मेरे पड़ोस में रहने वाले भाईसाहब और उनकी फेमिली थी।  मैंने जयपुर - ओखा साप्ताहिक एक्सप्रेस में रिजर्वेशन करवाया था इसलिए हमें यह यात्रा जयपुर से शुरू करनी थी और उसके लिए जरूरी था जयपुर तक पहुँचना।
     हमारे पड़ोस में रहने वाले एक भाईसाहब अपनी जायलो से हमें मुड़ेसी रामपुर स्टेशन तक छोड़ गए यहाँ से हमें मथुरा - बयाना पैसेंजर मिली जिससे हम भरतपुर उतर गए। भरतपुर से जयपुर तक हमारा रिजर्वेशन मरुधर एक्सप्रेस में था जो आज 2 घंटे की देरी से चल रही थी ,चूँकि पिछली पोस्ट में भी मैंने बताया था कि भरतपुर एक साफ़ सुथरा और प्राकृतिक वातावरण से भरपूर स्टेशन है।  यहाँ का केवलादेव पक्षी विहार पर्यटन क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है जहाँ आपको दूर देशों के पक्षी भी विचरण करते हुए देखने को मिलते हैं,|इसी की एक झलक भरतपुर स्टेशन की दीवारों पर चित्रकारी के माध्यम से हमें देखने को मिलती है…

JODHPUR

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मेहरान गढ़ की ओर
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       शाम को पांच बजे तक सिंधी कैंप बस स्टैंड आ गया यहाँ से गोपाल ने एक डीलक्स बस में मेरी टिकट ऑनलाइन करवा दी थी जिसके चलने का समय शाम सात बजे का था, काफी पैदल चलने की वजह से मैं काफी थक चुका था इसलिए बस में जाकर अपनी सीट देखी, यह स्लीपर कोच बस थी मेरी ऊपर वाली सीट थी उसी पर जाकर लेट गया। ट्रेन की अपेक्षा बस मे ऊपर वाली सीट मुझे ज्यादा पसंद है क्यूंकि बस की ऊपर वाली सीट में खिड़की होती है।           मैंने गोपाल को फोनकर बस के जोधपुर पहुंचने का टाइम पुछा उसने बताया रात को 2 बजे।  उसी हिसाब से अलार्म लगाकर मैं सो गया और फिर ऐसी नींद आयी की सीधे बाड़मेर से सत्तर किमी आगे डोरीमन्ना में जाकर खुली, जोधपुर और बाड़मेर कबके निकल चुके थे मैंने बस वाले से पुछा भाई हम कहाँ हैं मुझे तो जोधपुर उतरना था तुमने जगाया क्यों नहीं। वह मेरी तरफ ऐसा देख रहा था जैसे मैंने को महान काम कर दिया हो, उसने मुझसे कहा की आधा घंटा और सोते रहते तो पाकिस्तान पहुँच जाते।

WAIR FORT

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DATE :- 16 JULY 2016

ऊषा मंदिर और वैर फोर्ट 
       यात्रा एक साल पुरानी है परन्तु पब्लिश होने में एक साल लग गई, इसका एक अहम् कारण था इस यात्रा के फोटोग्राफ का गुम हो जाना परन्तु भला हो फेसबुक वालों का जिन्होंने मूमेंट एप्प बनाया और उसी से मुझे मेरी एक साल पुरानी राजस्थान की मानसूनी यात्रा के फोटो प्राप्त हो सके। यह यात्रा मैंने अपनी बाइक से बरसात में अकेले ही की थी। मैं मथुरा से भरतपुर पहुंचा जहाँ पहली बार मैंने केवलादेव घाना पक्षी विहार देखा परन्तु केवल बाहर से ही क्योंकि इसबार मेरा लक्ष्य कुछ और ही था और मुझे हर हाल में अपनी मंजिल तक पहुंचना ही था, मेरे पास केवल आज का ही समय था शाम तक मुझे मथुरा वापस भी लौटना था।

MUNABAO

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बाड़मेर की तरफ़ 

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    आज मैंने पहली बार सूर्य नगरी में कदम रखा था। मैं जोधपुर स्टेशन पर आज पहली बार आया था, यहाँ अत्यधिक भीड़ थी। कारण था बाबा रामदेव का मेला, जो जोधपुर - जैसलमेर रेलमार्ग के रामदेवरा नामक स्टेशन के पास चल रहा था। मैंने इंटरनेट के जरिये यहाँ से जैसलमेर के लिए रिज़र्वेशन करवा लिया था किन्तु वेटिंग में, अब पता करना था कि टिकट कन्फर्म हुई या नहीं। मैंने पूछताछ केंद्र पर जाकर पुछा तो पता चला कि टिकिट रद्द हो गई थी, मेरा चार्ट में नाम नहीं था।
     मैं स्टेशन के बाहर आया और यहाँ के एक ढाबे पर खाना खाया। यहाँ मैंने देखा कि सड़क पर दोनों तरफ चारपाइयाँ ही चारपाइयाँ बिछी हुई हैं बाकायदा बिस्तर लगी हुई। किराया था एक रात का मात्र 40 रुपये। परन्तु इसबार मेरा सोने का कोई इरादा न था मुझे बाड़मेर पैसेंजर पकड़नी थी जो रात 11 बजे चलकर सुबह 5 बजे बाड़मेर पहुंचा देती है। इसप्रकार मैं बाड़मेर भी पहुँच जाऊँगा और रात भी कट जाएगी। मैंने ऐसा ही किया।
    बाड़मेर पैसेंजर से मैं सुबह पांच बजे ही बाड़मेर पहुँच गया, स्टेशन पर बने वेटिंग रूम में नित्यक्रिया स…