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मैक्लोडगंज की वादियों में 

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         सुबह हो चुकी थी, और जल्द ही सुबह उठकर मैंने माता के दरवाजे पर जाकर उनको प्रणाम किया, यही पास में जमुनामाई जी की गद्दी है जहाँ हमारे पूर्वजों की यात्राओं का लेखा जोखा रहता है, इसबार भी मेरी यात्रा का लेखा जोखा उनके पोथी पत्रों में नोट हो चुका था। कहते हैं श्री ब्रजेश्वरी देवी सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश की कुलदेवी हैं और उनके भक्त यहाँ ऐसे ही खिंचे चले आते हैं जैसे चुम्बक से लोहा खिंचा चला आता है। मैं पिछली बार जब यहाँ आया था तो अच्छरा माता का मंदिर भी देखा था, तब मैंने मन ही मन सोचा था कि जब कल्पना को लेकर यहाँ आऊंगा तो अच्छरा माता के दर्शन के जरूर करूँगा। बस यही सोचकर कल्पना को बुलाया और बाणगंगा नदी के पास स्थित अच्छरा देवी के दर्शन को निकल पड़ा।

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मैक्लोडगंज की ओर
                 जाने वाले यात्री -  सुधीर उपाध्याय , कुमार भाटिया , सुभाष चंद गर्ग , मंजू  एवं  खुशी । 
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     मैंने घड़ी में देखा दोपहर के डेढ़ बजे थे, अचानक मन कर गया कि धर्मशाला और मैक्लोडगंज घूम के आया जाय, कौनसा यहाँ रोज रोज आते हैं, मैंने सभी से पुछा पहले तो कोई राजी नहीं हुआ, मैंने प्लान कैंसिल कर दिया, बाद में कुमार और मंजू का मन आ गया, अनके साथ बाबा और ख़ुशी भी राजी हो गए। सो चल दिए आज एक नई यात्रा पर काँगड़ा से धर्मशाला। धर्मशाला, काँगड़ा से करीब अठारह किमी है ऊपर पहाड़ो में और उससे भी आगे चार किमी ऊपर है मैक्लोडगंज।