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पाचोरा जंक्शन पर एक रात

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पाचोरा जंक्शन पर एक रात  



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     अब वक़्त हो चला था अपनी नई मंजिल की तरफ बढ़ने का, मतलब अब मुझे पाचोरा की तरफ प्रस्थान करना था। इसलिए मैं मुर्तिजापुर के बाजार से घूमकर स्टेशन वापस लौटा तो मैंने उन्हीं साईं रूप धारी बाबा को देखा जो कुछ देर पहले मेरे साथ अचलपुर वाली ट्रेन से आये थे। वो बाबा बाजार में जाकर मदिरा का सेवन करके स्टेशन लौटे और एक खम्भे से टकराकर गिर पड़े। स्थानीय लोगों ने उनकी मदद करने की कोशिश  बाबा ने वहीँ लेटे रहकर आराम करना उचित समझा। हालाँकि खम्भे से टकराकर बाबा का काफी खून भी निकला था  अंगूर की बेटी सारे गम भुला देती है।

ACHALPUR RAILWAY STATION

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अचलपुर रेलवे स्टेशन 




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      अचलपुर किले से निकलने के बाद ऑटो वाले भाई ने मुझे अचलपुर रेलवे स्टेशन के बाहर छोड़ दिया। ऑटो वाले भाई से काफी देर बात करने के बाद एक अपनेपन जैसा नाता सा जुड़ गया था और इसका एहसास तब हुआ जब हम दोनों एक दूसरे दूर होने लगे थे। उसके जाने से पहले ही मैंने स्टेशन पर बने टिकटघर में बैठे बाबू से पूछ लिया था कि ट्रेन कितने बजे तक आयेगी। बाबू ने कहा अभी दस बजे हैं दो घण्टे बाद, मतलब बारह बजे तक। टिकटबाबू के इतना कहते ही मेरे दिल वो सुकून प्राप्त हुआ जिसका मैं वर्णन नहीं कर सकता। अब मुझे पक्का यकीन हो गया था कि ट्रेन तो आएगी और आखिरकार मेरे यहाँ आने का मकसद पूर्ण हो गया था। ऑटो वाले भाई को विदा कर मैं स्टेशन पर आकर बैठ गया।

ACHALPUR FORT

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अचलपुर किला 

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     मैं अमरावती से अचलपुर के लिए बस द्वारा रवाना हो चुका था और इस बस ने मात्र एक घंटे में मुझे अचलपुर पहुँचा दिया। अचलपुर, महाराष्ट्र के विदर्भ प्रान्त में अमरावती से 50 किमी उत्तर दिशा में स्थित है। यह एक प्राचीन शहर है जो एक किले के परकोटे के अंदर बसा हुआ है, ब्रिटिश कालीन समय में अंग्रेज़ इसे एलिचपुर कहा करते थे जो कालांतर में अचलपुर कहलाता है। अचलपुर से 5 किमी दूर परतपाड़ा इसका जुड़वाँ शहर है जो अमरावती से चिकलधरा जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है, यहाँ से सतपुड़ा की पर्वत श्रृंखला भी दिखाई देने लगती है जिसपर मेलघाट के जंगल और मध्य प्रदेश की सीमा स्थित है। बस ने मुझे अचलपुर के मुख्य चौराहे पर छोड़ दिया और वापस अमरावती जाने के लिए खड़ी हो गई। मुझे यहाँ से रेलवे स्टेशन जाना था परन्तु उससे पहले मैं यहाँ स्थित किला देखना चाहता था।

यात्रा का केंद्र बिंदु - अमरावती

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यात्रा का केंद्र बिंदु - अमरावती

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     अकोला से मैं अमरावती एक्सप्रेस में बैठ गया और इमरजेंसी खिड़की वाली सीट पर अपना स्थान ग्रहण किया। रेलवे के क्रिस ऍप में जब शकुंतला रेलवे का कोई भी टाइम शो नहीं हुआ तो मुझे लगा कि शायद अचलपुर जाने वाली नेरोगेज की ट्रेन बंद गई होगी परन्तु मुझे अपने बनाये यात्रा रूट के हिसाब से ही चलना था। अगला स्टेशन मुर्तिजापुर ही है और जब ट्रेन यहाँ पहुँची तो मेरी नजरों ने उस नेरोगेज की ट्रेन को तलाश करना शुरू कर दिया। वो सामने ही खड़ी थी पर पता नहीं जाएगी भी कि नहीं, बस यही सोचकर मैं ट्रेन से नहीं उतरा और इसी ट्रैन से अमरावती तक जाने का फैसला कर लिया। 

MUMBAI

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मुम्बई - मेरी पहली यात्रा
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      एक बार मुम्बई देखने का हर किसी का सपना होता है, मेरा भी सपना था और साथ में मेरी माँ का भी । ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के पश्चात् हम सुबह मनमाड पहुंचे और राज्य रानी एक्सप्रेस पकड़कर मुम्बई सीएसटी । पहली बार मुम्बई देखने की एक अलग ही ख़ुशी थी आज मेरे मन में और इससे भी ज्यादा ख़ुशी थी अपनी माँ को मुम्बई दिखाने की। यूँ तो मैंने अपनी माँ को दिल्ली, कलकत्ता और चेन्नई तीनो महानगर दिखा रखे हैं पर  हर किसी के दिल में बचपन से ही जिस शहर को देखने का सपना होता है वो है मुम्बई । सीएसटी स्टेशन पर पहले मैंने और माँ ने भोजन किया और उसके बाद हम सीएसटी के बाहर निकले ।
     अंग्रेजों के समय में बना यह स्टेशन आज भी कितना खूबसूरत लगता है इसीलिए ये विश्व विरासत सूचि में दर्ज है। यहाँ हमने दोमंजिला बस भी पहली बार ही देखी थी। इसी बस द्वारा हम गेट वे ऑफ़ इंडिया पहुंचे। समुद्र तट पर स्थित यह ईमारत भी मुझे ताजमहल से कम नहीं लगी और साथ ही ताज होटल जिसे हम बचपन से टीवी अख़बारों में देखते आ रहे थे आज आँखों के सामने था ।

AURANGABAD

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घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग
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          त्रयंम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के पश्चात् में माँ को लेकर नाशिक रोड स्टेशन आ गया । अब मेरा प्लान माँ को घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन करवाना था। घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग, महाराष्ट्र प्रान्त के औरंगाबाद जिले से 25 किमी दूर एलोरा गुफाओं के पास स्थित है। मैंने मोबाइल में औरंगाबाद जाने वाली ट्रेन देखी। आज मुम्बई से काजीपेट के लिए एक नई ट्रेन शुरू हुई थी जिसका उद्घाटन मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनल स्टेशन पर हुआ। जब यह ट्रेन स्टेशन पर आई तो यह पूरी तरह खाली और फूलमालाओं से सजी हुई थी। मैं और माँ इसी ट्रेन से औरंगाबाद की तरफ बढ़ चले। मनमाड के बाद से रेलवे का दक्षिण मध्य जोन शुरू हो जाता है, इस रेलवे लाइन पर यात्रा करने का यह मेरा पहला मौका था। रास्ते में एक स्टेशन और भी मिला दौलताबाद । यहीं से मुझे एक गोल पहाड़ सा नजर आ रहा था, पता नहीं क्या था ।

TRAYMBKESHWAR

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त्रयंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग 
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      पूरी रात बस द्धारा सफर करने के बाद मैं और माँ सुबह चार बजे ही नाशिक बस अड्डे पहुँच गए , बारिश अब भी अपनी धीमी धीमी गति से बरस रही थी । त्रयंबकेश्वर जाने वाली कोई बस यहाँ नहीं थी, काफी देर इंतज़ार करने के बाद  हमे एक बस मिल गई जिससे हम सुबह पांच बजे तक त्रयंबकेश्वर पहुँच गए । यूँ तो मैं पहले भी एक बार नाशिक आ चुका हूँ, जब हमने पंचवटी और शिरडी के दर्शन ही किये थे। यहाँ तक आना नहीं हो पाया था परन्तु इसबार हमारी त्रयंबकेश्वर की यात्रा भी पूरी हो चली थी। अभी दिन निकला नहीं था, बरसात की वजह से थोड़ा ठंडा मौसम था। त्रयंम्बकेश्वर मंदिर के लिए हमने बस स्टैंड से ऑटो किया जिसने पांच मिनट बाद हमे मंदिर पर उतार दिया, बस स्टैंड से मंदिर की दूरी करीब एक किमी से भी कम है।

BHIMASHANKAR

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भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग 


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     शनिवारवाड़ा देखने के बाद दादाजी ने अपनी कार से हमें शिवाजी बस स्टैंड पर छोड़ दिया। उनसे दूर होने का मन तो नहीं कर रहा था परंतु मैं और माँ इस वक़्त सफर पर थे और सफर मंजिल पर पहुँच कर ही पूरा होता है, राह में अपने मिलते हैं और बिछड़ जाते हैं परंतु मंजिल हमेशा राही का इन्तज़ार करती है। और इसवक्त हमारी अगली मंजिल थी भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की ओर। बस स्टैण्ड पर धीमी धीमी बारिश हो रही थी, काफी बसें यहाँ खड़ी हुई थीं परन्तु भीमाशंकर की ओर कौन सी जाएगी ये पता नहीं चल पा रहा था।

PUNE JN.

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पुणे की एक शाम
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         करीब चौबीस घंटे का सफर तय करने के बाद गोवा एक्सप्रेस ने हमें पुणे के रेलवे स्टेशन पर उतार दिया, मैंने पहली बार पुणे का रेलवे स्टेशन देखा था, इससे पहले सिर्फ इसके बारे में सुना था। ट्रेन का सफर पूरा होने के बाद अभी हम आगे के बारे में सोच ही रहे थे कि कहाँ जाना है अंजान शहर है तभी माँ ने बताया कि मेरे दादाजी जो मेरे गाँव के ही हैं यहाँ रहते हैं उनका नाम योगेंद्र कुमार उपाध्याय है। मैंने घर पर फ़ोन करके उनका नंबर लिया और उनके पास कॉल किया ।
        जब मैंने उन्हें बताया कि मैं और माँ पुणे स्टेशन पर हैं तो मैं कह नहीं सकता कि उन्हें यह सुनकर कितनी ख़ुशी हुई होगी क्योंकि अचानक कोई अपना इतनी दूर से इतने पास आ जाए तो वो ख़ुशी छिपाये नहीं छिपती और साथ ही उन्होंने मुझे डांटा भी कि हमने अपने आने की खबर उन्हें पहले नहीं दी जबकि हमें दौण्ड जँ. पर उन्हें बताना चाहिए था कि हम पुणे स्टेशन पहुँच रहे हैं। ताकि हमें स्टेशन पर इतना इंतज़ार न करना पड़ता। दादाजी अपनी कार लेकर हमे स्टेशन लेने पहुंचे ।

NASHIK 2009

पंचवटी की ओर 
    शिरडी से सुबह महाराष्ट्र रोडवेज की बस पकड़कर हम नासिक की तरफ रवाना हो गए, नासिक में पंचवटी नामक तीर्थस्थान है जहाँ भगवान राम, सीता और लक्ष्मण सहित वनवास के दौरान रहा करते थे और यहीं से लंकापति रावण ने सीता माता का हरण किया था। नासिक पहुंचकर हम सबसे पहले गोदावरी के घाट पर पहुंचे यहाँ कुछ दिनों पहले ही कुम्भ का मेला लगा था और अब उस मेले के शेष अवशेष बचे हैं अर्थात ख़त्म हो चूका है।
   गोदावरीनदी  में स्नान करके हम पंचवटी पहुंचे, पांच बड़े वट के पेड़ के नीचे एक गुफा है जिसे सीता जी की रसोई कहा जाता है, माना जाता है कि भगवान श्री राम ने अपनी कुटिया यहीं इसी स्थान पर बनाई थी और यह स्थान आज के धरातल से काफी नीचे समां चुका है क्योंकि त्रेतायुग को बीते हुए भी लाखों वर्ष हो चुके है।

SHIRDI 2009

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पहली शिरडी यात्रा
     घूमने का शौक तो लगा रहता है बस मंजिल तलाशनी पड़ती है । आजकल एक गाना बहुत सुनने को मिल रहा है "शिरडी वाले साईं बाबा आया है तेरे दर पे सवाली "। बस फिर क्या था मन ने ठान लिया इसबार साईबाबा से मिलकर आना है। 2782 स्वर्णजयंती एक्सप्रेस में रिजर्वेशन करवाया कोपरगाँव तक और चल दिए साईबाबा से मिलने। साथ मैं हम कुल आठ लोग थे किशोरीलालजी,रश्मि,माँ-पापा, मैं, साधना, कुसमा मौसी, बड़ी मामी। ट्रेन ने हमें सुबह चार बजे कोपरगाँव स्टेशन पर पहुँचा दिया, यहाँ हमारी तरह और भी लोग साईबाबा के दर्शन हेतु आये हुए थे ।