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Sunday, March 4, 2018

KATNI JUNCTION


                                                             
                माँ जालपा देवी मंदिर - कटनी एवं रेल यात्रा 

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       रायपुर एक शानदार रेलवे स्टेशन है और हो भी क्यों न, आखिरकार यह छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी भी है। रेलवे स्टेशन पर बने भोजनालय में खाना खाकर मैं भूख से निर्वृत हो गया और प्लेटफॉर्म पर टहलने लगा। मुझे अब मथुरा की तरफ वापसी करनी थी इसलिए अब मैं कटनी की तरफ जाने वाली ट्रेन की प्रतीक्षा में था। मोबाइल में ट्रेन का पता किया, रात को सवा बारह बजे एक ट्रेन दिखाई दी गोंदिया - बरौनी एक्सप्रेस जो प्रतिदिन चलती है। इसको यहाँ रात सवा बारह बजे आना चाहिए था, परन्तु यह अपने निर्धारित समय से साढ़े तीन घंटे लेट यानी सुबह पौने चार बजे आई। मेरी पूरी रात ख़राब हो चुकी थी परन्तु सुबह की नींद सबसे ज्यादा अच्छी होती है इसलिए इसके जनरल कोच में खिड़की वाली सीट पर स्थान जमाया और चादर ओढ़ कर सो गया।

Saturday, February 1, 2014

UJJAINI





     उज्जैन दर्शन ( अवंतिकापुरी )

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       सुबह पांच बजे ही मैं और माँ तैयार होकर उज्जैन दर्शन के लिए निकल पड़े। अपना सामान हमने वेटिंगरूम में ही छोड़ दिया था। सबसे पहले हमें महाकाल दर्शन करने थे, आज दिन भी सोमवार था। यहाँ महाकालेश्वर के अलावा और भी काफी दर्शनीय स्थल हैं। महाकाल के दर्शन के बाद हमने एक ऑटो किराए पर लिया और ऑटो वाले ने हमें दो तीन घंटे में पूरा उज्जैन घुमा दिया। आइये अब मैं आपको उज्जैन के दर्शन कराता हूँ ।  


Friday, January 31, 2014

MALWA TO AVNTIKA

                                                                           इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

  
मालवा से अवंतिका की ओर  

     अब वक़्त हो चला था मालवा से अवंतिका की ओर प्रस्थान करने का, मैं और मेरी माँ ओम्कारेश्वर स्टेशन पर ट्रेन का वेट कर रहे थे। अपने सही समय पर ट्रेन आ चुकी थी, मेरा और माँ का इस ट्रेन में पहले से ही रिजर्वेशन कंफर्म था। यह मीटर गेज की ट्रेन थी इसलिए इसमें रिजर्वेशन के दो ही कोच थे। माँ तो सीट पर सो गई पर मुझे इस ट्रैक का नज़ारे देखने थे और देखना चाहता था कि मालवा और अवंतिका की दूरी में क्या विशेष है। परन्तु वाकई यह यात्रा एक रोमांचक यात्रा थी पहले नर्मदा नदी का पुल और इसके बाद कलाकुंड और पातालपानी रेलवे स्टेशन के बीच का घाट सेक्शन ।

Thursday, January 30, 2014

OMKARESHWAR



ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन 

      मुझे मेरी माँ को बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन कराने हैं जिनमें से इस बार मैं ओम्कारेश्वर एवं महाकाल की तरफ जा रहा हूँ। पहली बार मैंने माँ का आरक्षण स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस के AC कोच में करवाया था, और मैं जनरल टिकट लेकर जनरल डिब्बे में सवार हो गया, यह ट्रेन सुबह साढ़े आठ बजे आगरा कैंट से चली और रात दस बजे के करीब हम खंडवा पहुँच गए। यहाँ से हमें मीटर गेज की ट्रेन से ओम्कारेश्वर जाना है जो सुबह जाएगी। 

Monday, September 2, 2013

MAIHAR


माँ शारदा देवी के दरबार में - मैहर यात्रा 

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     मैहर धाम, इलाहाबाद - जबलपुर रेलवे लाइन पर मैहर स्टेशन के समीप है। माना जाता है कि यहाँ रात को पहाड़ पर देवी के मंदिर पर कोई भी नहीं रुक सकता है, यहाँ के लोगों का मानना है यहाँ आल्हा जो कि ऊदल के भाई होने के साथ साथ एक वीर योद्धा भी थे, आज भी देवी माँ कि पूजा सबसे पहले करने आते हैं। यह शक्तिपीठ बुंदेलखंड में स्थित है और आल्हा की भक्ति को समर्पित है। यहाँ आल्हा ने अपना सर काटकर देवी माँ के चरणों में चढ़ाया था। जिस कारण मंदिर कि सीढ़ियाँ चढ़ने से पहले आल्हा कि मूर्ति के दर्शन होते हैं जो भाला लिए हाथी पर सवार हैं।

Sunday, September 1, 2013

SATNA



सतना जंक्शन कीओर

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     इलाहबाद से हमने सतना जाने का विचार बनाया, इलाहाबाद से सतना का रास्ता तीन घंटे की दूरी पर था, जहाँ मेरा छोटा मौसेरा भाई गोपाल हमारा इंतज़ार कर रहा था। वो सतना में एल एन टी इंजीनियर है और एक होटल में रहता है। मैं और केसी इलाहाबाद स्टेशन पहुँचे, यहाँ आकर देखा तो एक बहुत ही लम्बी लाइन टिकट लेने के लिए लगी हुई थी, इतनी लम्बी लाइन में मेरे लगने की तो हिम्मत ही नहीं हुई। केसी कैसे भी करके टिकट ले आये और हमने कामायनी एक्सप्रेस में अपना स्थान जमाया।

Monday, July 29, 2013

SHYONPUR FORT




श्योंपुर क़िला 

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      इस गर्मी के माह में भी मुझे बरसात की वजह से काफी ठण्ड का सामना करना पड़ा। श्योपुर स्टेशन से बाहर निकलकर मैंने और दीपक ने एक सिगड़ी के किनारे बैठकर चाय पी। यह काफी अच्छी और मसालेदार चाय थी जिसकी कीमत थी मात्र पाँच रुपये। स्टेशन के ही ठीक सामने एक सड़क जाती है, यह सड़क कुन्नु राष्ट्रीय पार्क की ओर जाती है जो यहाँ से अभी काफी दूर था। समयाभाव के कारण हम वहाँ तक नहीं जा सकते थे। फिर भी हमने एक ऑटो वाले को रोककर पूछा - हाँ भाई यहाँ देखने को क्या है ? वो हमारी बात सुनकर थोडा अचरज में पड़ गया और बोला कि आप श्योपुर घूमने आये हो ? हमने कहा कि हाँ। वो हमारी बात सुनकर काफी खुश हुआ और बोला कि काश आपकी तरह मुझे ऐसे ही रोज पर्यटक मिले तो हमारे साथ साथ इस जिले ( श्योपुर ) का भी नाम दुनिया में मशहूर हो जाए । 

SHYONPUR KALAN




कुन्नु घाटी की एक रेल यात्रा  - श्योंपुर कलां की ओर 


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      कुन्नु घाटियों का असली नजारा सबलगढ़ के निकलने के बाद ही शुरू होता है। ट्रेन रामपहाड़ी, बिजयपुर रोड,कैमारा कलां होते हुए बीरपुर पहुंची। सबलगढ़ के बाद अगला मुख्य स्टेशन यही है, यहाँ आने से पहले ही  हो गया था, मतलब आसमान में घने काले बादलों की काली घटाएँ छाई हुईं थीं। ट्रेन की छत पर से बादल ऐसे नजर आ रहे थे जैसेकि अभी बरस पड़ेंगे, पर शायद आज बादलों को पता था कि मैं ट्रेन की छत पर और भीगने के सिवाय मुझपर कोई रास्ता ही नहीं बचेगा इसलिए आसमान में गरजते ही रहे। ट्रेन बीरपुर स्टेशन पहुंची, अब बादलों का धैर्य जबाब दे गया था, ट्रेन के स्टेशन पहुँचते ही बरस पड़े, मैं स्टेशन के टीन शैड के नीचे होकर केले खाता रहा, यहाँ केले आगरा की अपेक्षा काफी सस्ते थे और मुझे भूख भी काफी लगी हुई थी, दीपक भी मेरे साथ था। 

SABALGARH


कुन्नु घाटी में एक रेल यात्रा 


      यूँ तो किसी नई जगह जाने का विचार मन में कई बार आता है पर पूरा कब हो जाए यह तो ईश्वर ही जानता है। मेरे मन में पिछले कई दिनों से ग्वालियर - श्योंपुर नेरो गेज रेल यात्रा का विचार बन रहा था पर साथ के लिए मुझे किसी का सहयोग नहीं मिल रहा था इसलिए विचार, विचार ही बन कर रह जाता था। पर इस बार मेरे मौसेरे भाई दीपक की वजह से मेरा इस रेल यात्रा का सपना पूरा हो गया। कैसे ? आगे जानिये।

     दीपक और दिनेश मेरी मौसी के लड़के हैं और दोनों ही मुझसे छोटे हैं, दोनों ही ग्वालियर में नौकरी करते हैं। कल शाम को ही गाँव से ग्वालियर जाने के लिए आगरा आये थे, मैंने दीपक को इस रेल यात्रा पर चलने के लिए बताया, वह तुरंत चलने के लिए राजी हो गया। मैंने ग्वालियर से श्योंपुर जाने वाली ट्रेन का टाइम देखा सुबह 6:25 था यानी की हमें रात को तीन बजे ही किसी ट्रेन से ग्वालियर के लिए निकलना था, पर नींद का कोई भरोसा नहीं होता, सोते ही रह गए। सुबह आँख भी खुली तो घड़ी पांच बजा चुकी थी, अब तो ट्रेन मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। यह एक मात्र ट्रेन थी जो ग्वालिअर से सुबह चलकर शाम को श्योंपुर पहुँचती है। पर वो कहते है ना चाहो तो सब कुछ है आसान। बस यही बात दिमाग में आई और दिमाग ने काम करना शुरू कर दिया। अब आगे जानिये की यह ट्रेन मैंने कैसे पकड़ी ?