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Monday, December 17, 2018

JAIT

                                                                                              

अघासुर का वधस्थल - जय कुण्ड   

       वृन्दावन के नजदीक हाइवे पर स्थित जैंत ग्राम, ब्रज के चौरासी कोस की परिक्रमा में आने वाला एक प्रमुख ग्राम है। यहाँ प्राचीन समय का जयकुंड स्थित है। कहा जाता है यही वो स्थान है जहाँ भगवान श्री कृष्ण को मारने के लिए कंस ने अघासुर नाम के दैत्य को भेजा था जो रिश्ते में पूतना राक्षसी का भाई भी था। अघासुर एक विशालकाय अजगर था जो इस इस स्थान पर आकर छुप गया और जब श्री कृष्ण गाय चराते हुए अपने ग्वाल वालों के साथ यहाँ पहुँचे तो अघासुर ने समस्त ग्वालवालों को निगलना शुरू कर दिया। भगवान श्री कृष्ण, अघासुर की इस चतुराई को समझ गए और अघासुर का निवाला बनने के लिए उसके सम्मुख आ गए। अघासुर ने बिना कोई पल गंवाए श्री कृष्ण को निगलना शुरू कर दिया। 

Thursday, October 12, 2017

RADHAKUND



 राधाकुंड मेला - अहोई अष्टमी की एक रात


       माना जाता है कि अहोई अष्टमी की मध्य रात्रि को राधाकुंड में स्नान किया जाये तो एक वर्ष के अंदर संतान प्राप्ति का सुख निश्चित प्राप्त होता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्य रात्रि राधाकुंड में स्नान करने का पौराणिक महत्त्व है इस दिन ब्रज की अधिष्ठात्री देवी श्री राधारानी इस कुंड में एक साथ स्नान करने वाले भक्तो को संतान प्राप्ति का फल देती हैं और साल भर के भीतर उनके यहाँ संतान जन्म लेती है। इस दिन गोवर्धन मथुरा स्थित राधाकुंड में विशाल मेला लगता है। 

     राधाकुंड का निर्माण स्वयं भगवान कृष्ण ने अपनी बांसुरी की नोक से खोदकर किया था जब उन्होंने बछड़े का रूप लेकर आये महादैत्य अरिष्टासुर का वध किया था जिससे उन्हें गोहत्या का पाप लगा। राधारानी के कहने पर इस पाप से मुक्ति पाने के भगवान कृष्ण ने सभी तीर्थों का जल राधाकुंड में मिलकर उसमे स्नान किया और गोहत्या के पाप से मुक्ति पाई साथ ही राधारानी को यह वरदान दिया कि कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्य रात्रि जो भी इस कुंड में स्नान करेगा उसे संतान की प्राप्ति अवश्य होगी। 

Saturday, October 7, 2017

PAGALBABA TAMPLE


पागलबाबा मंदिर 



     मेरी माँ बचपन से ही हर अमावस्या को श्री ठाकुर जी के दर्शन करने आगरा से वृन्दावन जाती थीं, मथुरा से वृन्दावन जाते समय एक बहुमंजिला मंदिर पड़ता था जिसे देखकर मैं माँ से पूछता था कि माँ यह मंदिर किसका है, माँ जवाब दे देती थी पागल बाबा का। भच्पन बहुत ही चंचल होता है जानने की बड़ी  इच्छा होती थी कि  इन्हे पागलबाबा क्यों कहते हैं।  धीरे धीरे समय गुजर गया और मैं बड़ा हो गया, आज जब ठाकुरजी की कृपा से अपना आशियाना और नौकरी ब्रज में ही है तो क्विड लेकर मांट से सीधे कालिंदी के किनारे पहुँचा एक पीपों से बने हुए पल को पारकर मैं वृन्दावन पहुँचा और मथुरा रोड पर स्थित पागलबाबा के दर्शन किये।  और वहां जाकर जाना कि पागलबाबा कौन थे। गूगल पर जाकर आपको इनकी कहानी पढ़ने को मिल जाएगी। हम तो घुम्मकड़ हैं बस अपनी यात्रा का विवरण ही दे सकते हैं। 

Sunday, October 1, 2017

BALDEV




दाऊजी मंदिर - बलदेव धाम 


     यूँ तो मथुरा को भगवान कृष्ण और राधा की लीलास्थली के रूप में जाना जाता है किन्तु भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलभद्र जी भी थे जो कि शेषनाग के अवतार थे। कृष्ण जी उन्हें बड़े प्यार से दाऊ भईया कह कर पुकारते थे। त्रेतायुग में भगवान् राम के छोटे भाई लक्ष्मण के रूप में शेषनाग जी ने अवतार लिया था और द्वापर युग में बलभद्र के रूप ये देवकी की सातवीं संतान थे जो संकर्षण के जरिये बसुदेव जी की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ से जन्मे थे जिस कारन इन्हे संकर्षण भगवान भी कहा जाता है। मथुरा से सादाबाद मार्ग पर 20  किमी आगे बलदेव नामक स्थान जहाँ दाऊजी का विशाल मंदिर है। यहाँ दूर दूर से काफी संख्या में लोग दाऊजी के दर्शन करने आते हैं।

Friday, September 29, 2017

KUSUM SAROVER


गोवर्धन परिक्रमा एवं कुसुम सरोवर

       अभी कुछ ही दिनों पहले मेरी कंपनी का गोवर्धन क्षेत्र में एक इवेंट लगा जिसकी मुनियादी गोवेर्धन क्षेत्र के आसपास कराई जानी थी जिसकी जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई। मैंने एक टिर्री बुक की, जिसमे स्पलेंडर बाइक फिट थी और पीछे आठ दस सवारियों के बैठने की जगह थी। इस टिर्री के साथ मैंने मुनियादी करने  के लिए  गोवर्धन परिक्रमा क्षेत्र को चुना। मौसम आज सुहावना था, सुबह सुबह खूब तेज बारिश पड़ी इसलिए मौसम में काफी ठंडक भी थी। गोवर्धन का परिक्रमा मार्ग कुल 21 किमी का है जो  दो भागों में विभाजित है बड़ी परिक्रमा और छोटी परिक्रमा। बड़ी परिक्रमा कुल चार कोस की है, मतलब 12 किमी और छोटी 3 कोस की मतलब 9 किमी की।   

      गोवर्धन के मुख्य मंदिर दानघाटी से परिक्रमा शुरू होती है जो आन्यौर होती हुई राजस्थान की सीमा में प्रवेश करती है जहाँ पौराणिक पूँछरी के लौठा का मुख्य मंदिर है। यह गोवर्धन पर्वत का अंतिम स्थल है इसके बाद परिक्रमा पर्वत के दूसरी तरफ वापस दानघाटी की तरफ मुड़ जाती है जो जतीपुरा होते हुए वापस गोवर्धन जाती है। यह 12 किमी की बड़ी परिक्रमा है, यहाँ से अब छोटी परिक्रमा शुरू होती है जो गोवर्धन के बड़े बाजार से होती हुई राधाकुंड पहुंचती है। राधाकुंड से आगे कुसुम सरोवर के नाम से एक पौराणिक स्थल है जो अत्यंत ही खूबसूरत है।

    कुसुम सरोवर से सीधे हम वापस गोवर्धन पहुंचते हैं, यह परिक्रमा इन्फिनिटी के डिज़ाइन की तरह है, गोवर्धन परिक्रमा के दौरान अनेको छोटे और बड़े मंदिर पड़ते हैं जो कि दर्शनीय हैं।


गोवर्धन का एक मंदिर 

ऋणमोचन कुंड 

मानसी गंगा द्धार 

गोवर्धन 

जय गिर्राज जी महाराज 



दानघाटी मंदिर 




पूँछरी का लौठा , गोवर्धन, राजस्थान 





रूद्र कुंड 


चूतड़ टेका , एक विश्राम स्थल 

कुसुम सरोवर 

कुसुम सरोवर 

कुसुम सरोवर 

टिर्री वाला भाई 




प्राचीन कुंआ , कुसुम सरोवर 




जपाकर शर्मा , सिद्ध यात्री निवास होटल के डायरेक्टर 
  

Monday, September 18, 2017

SHANTANU KUND




शांतनु कुंड -  एक पौराणिक स्थल , सतोहा 


         भगवान श्री कृष्ण की ब्रजभूमि में ऐसे कई स्थान हैं जिनका सीधा सम्बन्ध या तो इतिहास से है और सर्वाधिक पुराणों से है। मैंने सभी पुराण तो नहीं पढ़े हैं परन्तु रामायण और श्रीमद भागवत का अध्ययन और श्रवण कई बार किया है, इसलिए मुझे उन स्थानों पर जाने और उन्हें देखने में विशेष रूचि है। आज ऐसे ही एक स्थान पर मैं कंपनी की गाडी क्विड से नीरज के साथ मथुरा के सतोहा ग्राम में पहुंचा जहाँ एक पौराणिक कुंड ब्रज की अनमोल धरोहर है। इस कुंड का नाम महाभारत युद्ध से पूर्व हिस्तनापुर के सम्राट महाराज शांतनु के नाम पर है। माना जाता है कि महाराज शांतनु ने इस स्थान पर रहकर तपस्या की थी।

Sunday, September 3, 2017

RAM TAL




रामताल - एक पौराणिक स्थल 



        अभी कुछ ही दिनों पहले सुर्खियों में एक खबर आई थी कि वृन्दावन के सुनरख गाँव के पास एक कुंड मिला है जिसका नाम रामताल है , बताया जाता है कि ये 2500 बर्ष से भी पुराना है और उसी समय की काफी वस्तुएं भी पुरातत्व विभाग को वहां खुदाई के दौरान मिली। पुरातत्व विभाग ने यहाँ उत्खनन सन 2016 में शुरू कराया तो एक प्राचीन और पौराणिक धरोहर के रूप में रामताल को जमीन के अंदर पाया। यह खबर सुनकर मेरा मन भी बैचैन हो उठा और आखिरकार मैं भी रामताल देखने निकल पड़ा। हालाँकि ड्यूटी पर ही था किसी काम से कंपनी की गाडी लेकर मैं और नीरज वृन्दावन आये और यहीं से हम रामताल पहुंचे।

Saturday, September 2, 2017

KANS FORT


कंस किला और वेदव्यास जी का जन्मस्थान


     कई बार सुना था कि मथुरा में कहीं कंस किला है, पर देखा नहीं था। आज इरादा बना लिया था कि जो चाहे हो देखकर रहूँगा। मैं अपनी बाइक से मथुरा परिक्रमा मार्ग पर गया और पाया कि आज ब्रज की अनमोल धरोहरों का आज मैं अकेला अवलोकन कर रहा हूँ। सबसे पहले मेरी बाइक चक्रतीर्थ पहुंची जहाँ भगवान शिव् का भद्रेश्वर शिवलिंग के दर्शन हुए और मंदिर के ठीक सामने चक्रतीर्थ स्थित है। इसके बाद कृष्ण द्वैपायन भगवान वेदव्यास जी की जन्मस्थली पहुंचा। यहाँ भी सुन्दर घाट बने हुए थे पर अफ़सोस यमुना यहाँ से भी काफी दूर चली गई थी और यमुना में से निकली एक नहर इन घाटों को छूकर निकल रही थी।

Friday, August 11, 2017

KERALA EXPRESS 17




केरला एक्सप्रेस  - मथुरा से तिरुपति


         केरला एक्सप्रेस जैसी ट्रेन में कन्फर्म सीट पाने के लिए रिजर्वेशन कई महीने पहले ही कराना होता है और ऐसा ही मैंने भी किया। इसबार मानसून की यात्रा का विचार साउथ की तरफ जाने का था, मतलब तिरुपति बालाजी। चेन्नई के पास ही हैं लगभग थोड़ा बहुत ही फर्क है, उत्तर से दक्षिण जाने में जो समय चेन्नई के लिए लगता है वही समय तिरुपति जाने के लिए भी लगता है। इसके लिए जरुरी है कि अगर आप ट्रेन से जा रहे है तो आपकी टिकट कन्फर्म हो। मैंने अप्रैल में ही रिजर्वेशन करवा लिया था और मुझे तीनो सीट कन्फर्म मिली। अब इंतज़ार यात्रा की तारीख आने का था और जब यह तारीख आई तो एक सीट मैंने कैंसिल करदी। अब मैं और माँ ही इस सफर के मुसाफिर थे।

Saturday, July 15, 2017

RASKHAN TOMB



रसखान समाधि 

     महावन घूमने के बाद रमणरेती की तरफ आगे ही बढ़ा था कि रास्ते में एक बोर्ड लगा दिखाई दिया, और उसी बोर्ड की लोकेशन पर मैं भी चल दिया। आज मेरी गाडी घने जंगलों के बीच से निकलकर उस महान इंसान की समाधि पर आकर रुकी जिनके नाम को हम इतिहास में ही नहीं बल्कि अपनी हिंदी की किताब में भी बचपन से पढ़ते आ रहे थे और वो थे कृष्ण भक्त रसखान। आज यहाँ एकांत में रसखान जी की समाधी देखकर थोड़ा दुःख तो हुआ पर ख़ुशी भी हुई कि आज एक ऐसे भक्त के पास आया हूँ जिसने मुसलमान होते हुए भी भगवन कृष्ण की वो भक्ति पाई जो शायद कोई दूसरा नहीं पा सका। 

MAHAVAN




महावन - पुराना गोकुल 

     यूँ तो मथुरा में रहते हुए काफी समय हो गया था पर अपना शहर घूमने का कभी वक़्त ही नहीं मिला, आज मिला तो गोकुल की तरफ निकल गया। गोकुल बैराज से उतरते ही जो गोकुल दिखाई देता है वो नया बसा हुआ गोकुल है पर कहा जाता है महावन स्थित गोकुल ही असली और पुराना गोकुल है। इसलिए मैं भी अपनी बाइक से महावन गया और हर उस स्थान को देखा जो भगवान श्री कृष्ण की लीलास्थलियों से जुड़ा है आइये आपको भी उन स्थानों का भ्रमण कराता हूँ।  

Sunday, February 26, 2017

KOKILAVAN



श्री शनिदेव धाम - कोकिलावन 


       आज शनिवार है और 25 फरवरी भी। आज मेरी ऑफिस की छुट्टी थी और कल मेरी शादी की सालगिरह थी इसलिए कल तो कहीं जा न सका पर आज की इस छुट्टी को बेकार नहीं जाने देना चाहता था। कल्पना ने और मैंने श्री राधारानी के दरबार में जाने का विचार बनाया और हम चल दिए अपनी एवेंजर बाइक लेकर ब्रज की एक अनोखी सैर पर।

      सबसे पहले हम माँ नरी सेमरी के द्वार पहुंचे, यह ब्रज की कुलदेवी हैं और नगरकोट वाली माँ का ही दूसरा रूप हैं यह यहाँ कैसे पधारीं इसका वरन आपको जल्द ही अगले ब्लॉग में जानने को मिल जायेगा। यहाँ आगे से हम  सीधे कोसीकलां पहुंचे यह उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सीमा पर स्थित मथुरा जनपद का आखिरी क़स्बा है यहीं से एक रास्ता कोकिलावन, नंदगाँव, बरसाना  होते हुए गोवर्धन को जाता है।

Monday, November 28, 2016

BRAHMAND GHAT



ब्रह्माण्डघाट

     भगवान श्री कृष्ण ने मथुरा में जन्म लिया और मथुरा की भूमि पर अनगिनत लीलाएं की।  इनकी लीलाओं से जुड़े अनेकों स्थान आज भी मथुरा और उसके आसपास देखे जा सकते हैं। हमने आगरा छोड़कर अपना स्थाई निवास अब मथुरा बना लिया है इसलिए आज  मैं मथुरा आसपास घूमने के लिए निकला और और गोकुल के नजदीक एक घाट  पर पहुंचा। जिसका नाम है ब्रह्माण्डघाट।
      गोकुल के नजदीक ही यमुना नदी के किनारे यह घाट स्थित है । कहते हैं यह वही स्थान है जहाँ भगवान श्री कृष्ण ने बचपन में माटी खाई थी, उन्हें माटी खाते देख माँ यशोदा उन्हें मुँह खोलने को कहती हैं तो श्री कृष्ण के छोटे से मुख में सारा ब्रह्माण्ड देख आश्चर्य चकित रह जाती हैं । यहां से मेरी ब्रजयात्रा प्रारम्भ होती है। 


Saturday, August 6, 2016

GOA EXPRESS



मथुरा जं. से पुणे जं. -  गोवा एक्सप्रेस से एक सफर 

     अगस्त का महीना मेरे प्रिय महीनों में से एक है, इसलिए नहीं कि यह मेरा जन्मदिन का माह है बल्कि इसलिए कि यह एक मानसूनी महीना है, एक ख़ूबसूरती सी दिखाई देती है इस माह में। सूर्यदेव का लुकाछिपी का खेल और इंद्रधनुष के दर्शन, मन को काफी लुभाते हैं। इस मानसूनी महीने में यात्रा करने का एक अपना ही मज़ा है, कुछ दिन पहले मथुरा से नजदीक भरतपुर जिले की शानदार मानसूनी यात्रा मैंने अपनी एवेंजर बाइक से की थी पर यह एक छोटी सी यात्रा थी। मेरा मन इस माह में कहीं दूर जाना चाहता था पर कहाँ ये समझ नहीं आ रहा था।

Thursday, November 23, 2006

PANJAB MAIL AND MEERA BHARDWAJ



मैं, मीरा मौसी और पंजाब मेल


          ना जाने क्या खाश था आजकी इस सुबह में, कि मैंने सोचा नहीं था आज मेरा वो सपना भी पूरा हो जायेगा जिसे मैं ना जाने कब से देखता आ रहा था और वो सपना था मीरा मौसी के साथ ट्रेन में एक यात्रा करने का।  आज सुबह थोड़ा लेट, अपनी आईडिया मोबाइल की ऑफिस पहुंचा तो साथ में काम करने वाले वंशीधर जी ने बताया कि सुधीर तेरे लिए एक खुश खबरी है। मैंने कहा क्या? तो वंशीधर जी ने कहा कि तेरी मौसी का फोन आया है तुझसे बात करना चाहती है। उनकी यह बात सुनकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि मैंने सोचा भी नहीं था कि वो सीधे मेरी ऑफिस में भी फोन कर सकती है। मैंने जल्दी से अपनी जेब से अपना मोबाइल निकाला तो देखा वो बंद था।अब समझ में आया कि उसने मेरी ऑफिस में फोन क्यों किया और अगर किया है तो जरूर कोई आवश्यक कार्य  ही होगा। 

       मैंने तुरंत वापस कॉलबैक किया तो जबाब में मौसी ने कहा कि आज वो दिल्ली जाना चाहती है अपनी बड़ी बहिन से मिलने जो दिल्ली में रहती हैं, बिजली के तारों की चपेट में आ गई थी जिनसे वो बाल बाल बची थी। मैं यह सुनकर एक तरफ तो बहुत खुश हुआ परन्तु इस घटनाक्रम को सुनने के पश्चात दुःख भी हुआ। मैंने तुरंत उससे दिल्ली चलने के लिए हाँ बोल तो दी परन्तु ये नहीं सोचा था कि मुझे दिल्ली जाना है, पास के गांव में नहीं। पर जो भी हो मेरे लिए मौसी की बात पत्थर की लकीर थी उसने जो बोला वो तो हर हाल में पूरा होना ही था चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़ता। मैंने तुरंत वंशीधर जी से कुछ रुपये लिए और घर आकर माँ से एक बारात में जाने का बहाना बनाकर घर से निकल लिया। 

        स्टेशन पहुंचकर केरला एक्सप्रेस मुझे तैयार खड़ी मिली, पिताजी का रेलवे पास मेरेपास था ही जिसमे मेरा भी नाम लिखा हुआ था। मैं मथुरा पहुंचा और इसके बाद एक ऑटो से मैं राया पहुंचा। राया स्टेशन पर देखा तो मौसी मेरे इंतज़ार में सीट पर बैठी हुई मेरी राह देख रही थी। साथ में उसकी माँ भी थी और उसका एक भतीजा। ये वही स्टेशन था जहाँ कभी मैं मौसी के गांव से वापस अपने आगरा को जाता था तो इस स्टेशन पर आकर उन्हें और बाकी सभी को बहुत याद किया करता था आज उसी स्टेशन पर वो मेरे सामने बैठी हुईं थीं। राया पर उन दिनों मीटर गेज की ट्रेन चला करती थी, कासगंज की तरफ से एक ट्रेन आई और भारी धक्का मुक्की के बीच हम मथुरा स्टेशन पहुंचे। 

       शाम हो चली थी, दिल्ली जाने के लिए पंजाब मेल का अनाउंस हो रहा था। मैं मौसी को लेकर प्लेटफॉर्म नंबर दो पर पहुँचा। यहाँ पहली बार मैंने मौसी को कॉफी ऑफर की और उन्होंने वो ख़ुशी ख़ुशी पी। कुछ ही समय में ट्रेन भी प्लेटफॉर्म पर आ चुकी थी। हम स्लीपर के एक कोच में चढ़ गए, और एक खाली कूपे में बैठ गए। मेरे सामने की सीट पर मौसी अपनी माँ के साथ बैठी हुईं थीं और चलती ट्रेन में से मथुरा को जाते हुए और दिल्ली को आते हुए देख रही थी और मैं सिर्फ अपनी मौसी को। 

        रात दस बजे के आसपास हम नई दिल्ली स्टेशन पहुंचे और फिर वहां से मेट्रो पकड़कर द्वारिका की तरफ रवाना हो गए। यह पहला मौका था जब मौसी पहली बार मेट्रो में बैठी थी, हालांकि वो दिल से बहुत खुश हुई होगी परन्तु जिस वजह से उसे ये यात्रा करनी पड़ी थी वो ख़ुशी की यात्रा नहीं थी। मैंने उसके चेहरे और मंद मंद मुस्कान के पीछे छुपे हुए उस गम को भी देखा जो उसके अंदर उसकी बहिन के लिए था। वो अपनी इस बड़ी बहिन से बेइंतहा प्यार करती थी और अपना सबकुछ उन्हें ही मानती थी और जब वही बहिन कष्ट में हो तो खुशी कैसी ? मैं मौसी के बराबर समझदार और सब्र वाला इंसान नहीं था, मैं बिना परिस्थिति देखे भी उससे वो कह उठता था जो वो नहीं सुनना चाहती थी परन्तु उसने कभी मेरी किसी भी बात का बुरा नहीं माना और हर परिस्थिति में मेरे सवाल का जबाब मुस्कुराकर ही दिया। 

       बातों ही बातों में द्धारिका मोड़ स्टेशन भी आ गया और मुझे अब लगने लगा था कि मेरी और मौसी की यह यात्रा बस यहीं तक थी। द्धारिका मोड़ स्टेशन के बाहर मौसी के बड़े भाई किशोरजी और जीजाजी अपनी कार लिए बाहर हमारा इंतज़ार कर रहे थे। मैं यहीं से वापस लौट जाना चाहता था परन्तु किशोर मामाजी ने मुझे घर चलने के लिए और बड़ी मौसी से मिलने के लिए कहा। बड़ी मौसी से मिलना मेरे लिए भी उतना ही आवश्यक था जितना मीरा मौसी के लिए, इसलिए मैं भी उनके साथ उनके घर चला गया। रात भर मैं किशोर मामाजी के साथ उसी कार में सोया और सुबह मौसी से बिना मिले ही वापस आगरा आ गया। हालाँकि मैं मौसी के साथ दिल्ली देखना भी चाहता था कर उसे दिखाना भी परन्तु मेरे लिए इतना ही बहुत था कि आज वो मेरे साथ मेरे मनपसंद शहर और देश की राजधानी में थी।

मीरा मौसी कुछ बच्चों के साथ 

Thursday, March 7, 2002

आयराखेड़ा ग्राम की एक बारात

   

आयराखेड़ा ग्राम की एक बारात


     काफी पुरानी बात है जब मैं हाई स्कूल में था और मेरी बोर्ड के एग्जाम नजदीक थे। मेरा आज साइंस का प्रेक्टिकल था। लैब में मुझसे एक वीकर और एक केमिकल की बोतल फूट गई जिस कारण सर ने मुझे तोड़ दिया। सजा पाकर थका हारा जब मैं घर पहुंचा तो माँ ने याद दिलाया कि आज मेरी दूर की मौसी की शादी है इसलिए मुझे आयराखेड़ा जाना पड़ेगा मैंने घडी में देखा तो दोपहर के डेढ़ बजे थे यानी आगरा कैंट से मथुरा के किये कोई ट्रेन नहीं थी ।

    आयरा खेड़ा मेरी माँ का गाँव है जो मथुरा कासगंज रेल मार्ग पर स्थित राया स्टेशन से पांच किलोमीटर दूर है। आयराखेड़ा गाँव का नाम सरकारी कागजों में बिन्दुबुलाकी है, अतः गूगल मैप में भी इसे बिन्दुबुलाकी के नाम से ही खोजा जा सकता है। मुझे याद आया कि आगरा फोर्ट से मथुरा के लिये एक ट्रेन है जिसका नाम है गोकुल एक्सप्रेस ।