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Tuesday, June 18, 2013

पठानकोट की तरफ




   पठानकोट की तरफ 

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     समता एक्सप्रेस के आने से पांच मिनट पहले ही हम स्टेशन पहुँच गए थे, आज ट्रेन अपने निर्धारित समय से पहले ही आ गयी थी, हमने अपनी सीट पर अपना स्थान ग्रहण किया और चल दिए निजामुद्दीन की ओर। मुझे इस यात्रा मैं कल्पना को अपने साथ ना लाने का बड़ा ही दुःख रहा, हम निजामुद्दीन पहुंचे, समता एक्सप्रेस की सेवा यहाँ समाप्त हो गयी। यहाँ से हमें एक लोकल मिली जो शकूरबस्ती जा रही थी , हम इसी लोकल में चढ़ लिए,यह प्रगति मैदान पर आकर खड़ी हो गयी, वैसे यहाँ बहुत ही कम ट्रेनों का स्टॉप है और ये सभी ट्रेन लोकल ही कहलाती हैं। कांगड़ा 

Thursday, November 23, 2006

PANJAB MAIL AND MEERA BHARDWAJ



मैं, मीरा मौसी और पंजाब मेल


          ना जाने क्या खाश था आजकी इस सुबह में, कि मैंने सोचा नहीं था आज मेरा वो सपना भी पूरा हो जायेगा जिसे मैं ना जाने कब से देखता आ रहा था और वो सपना था मीरा मौसी के साथ ट्रेन में एक यात्रा करने का।  आज सुबह थोड़ा लेट, अपनी आईडिया मोबाइल की ऑफिस पहुंचा तो साथ में काम करने वाले वंशीधर जी ने बताया कि सुधीर तेरे लिए एक खुश खबरी है। मैंने कहा क्या? तो वंशीधर जी ने कहा कि तेरी मौसी का फोन आया है तुझसे बात करना चाहती है। उनकी यह बात सुनकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि मैंने सोचा भी नहीं था कि वो सीधे मेरी ऑफिस में भी फोन कर सकती है। मैंने जल्दी से अपनी जेब से अपना मोबाइल निकाला तो देखा वो बंद था।अब समझ में आया कि उसने मेरी ऑफिस में फोन क्यों किया और अगर किया है तो जरूर कोई आवश्यक कार्य  ही होगा। 

       मैंने तुरंत वापस कॉलबैक किया तो जबाब में मौसी ने कहा कि आज वो दिल्ली जाना चाहती है अपनी बड़ी बहिन से मिलने जो दिल्ली में रहती हैं, बिजली के तारों की चपेट में आ गई थी जिनसे वो बाल बाल बची थी। मैं यह सुनकर एक तरफ तो बहुत खुश हुआ परन्तु इस घटनाक्रम को सुनने के पश्चात दुःख भी हुआ। मैंने तुरंत उससे दिल्ली चलने के लिए हाँ बोल तो दी परन्तु ये नहीं सोचा था कि मुझे दिल्ली जाना है, पास के गांव में नहीं। पर जो भी हो मेरे लिए मौसी की बात पत्थर की लकीर थी उसने जो बोला वो तो हर हाल में पूरा होना ही था चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़ता। मैंने तुरंत वंशीधर जी से कुछ रुपये लिए और घर आकर माँ से एक बारात में जाने का बहाना बनाकर घर से निकल लिया। 

        स्टेशन पहुंचकर केरला एक्सप्रेस मुझे तैयार खड़ी मिली, पिताजी का रेलवे पास मेरेपास था ही जिसमे मेरा भी नाम लिखा हुआ था। मैं मथुरा पहुंचा और इसके बाद एक ऑटो से मैं राया पहुंचा। राया स्टेशन पर देखा तो मौसी मेरे इंतज़ार में सीट पर बैठी हुई मेरी राह देख रही थी। साथ में उसकी माँ भी थी और उसका एक भतीजा। ये वही स्टेशन था जहाँ कभी मैं मौसी के गांव से वापस अपने आगरा को जाता था तो इस स्टेशन पर आकर उन्हें और बाकी सभी को बहुत याद किया करता था आज उसी स्टेशन पर वो मेरे सामने बैठी हुईं थीं। राया पर उन दिनों मीटर गेज की ट्रेन चला करती थी, कासगंज की तरफ से एक ट्रेन आई और भारी धक्का मुक्की के बीच हम मथुरा स्टेशन पहुंचे। 

       शाम हो चली थी, दिल्ली जाने के लिए पंजाब मेल का अनाउंस हो रहा था। मैं मौसी को लेकर प्लेटफॉर्म नंबर दो पर पहुँचा। यहाँ पहली बार मैंने मौसी को कॉफी ऑफर की और उन्होंने वो ख़ुशी ख़ुशी पी। कुछ ही समय में ट्रेन भी प्लेटफॉर्म पर आ चुकी थी। हम स्लीपर के एक कोच में चढ़ गए, और एक खाली कूपे में बैठ गए। मेरे सामने की सीट पर मौसी अपनी माँ के साथ बैठी हुईं थीं और चलती ट्रेन में से मथुरा को जाते हुए और दिल्ली को आते हुए देख रही थी और मैं सिर्फ अपनी मौसी को। 

        रात दस बजे के आसपास हम नई दिल्ली स्टेशन पहुंचे और फिर वहां से मेट्रो पकड़कर द्वारिका की तरफ रवाना हो गए। यह पहला मौका था जब मौसी पहली बार मेट्रो में बैठी थी, हालांकि वो दिल से बहुत खुश हुई होगी परन्तु जिस वजह से उसे ये यात्रा करनी पड़ी थी वो ख़ुशी की यात्रा नहीं थी। मैंने उसके चेहरे और मंद मंद मुस्कान के पीछे छुपे हुए उस गम को भी देखा जो उसके अंदर उसकी बहिन के लिए था। वो अपनी इस बड़ी बहिन से बेइंतहा प्यार करती थी और अपना सबकुछ उन्हें ही मानती थी और जब वही बहिन कष्ट में हो तो खुशी कैसी ? मैं मौसी के बराबर समझदार और सब्र वाला इंसान नहीं था, मैं बिना परिस्थिति देखे भी उससे वो कह उठता था जो वो नहीं सुनना चाहती थी परन्तु उसने कभी मेरी किसी भी बात का बुरा नहीं माना और हर परिस्थिति में मेरे सवाल का जबाब मुस्कुराकर ही दिया। 

       बातों ही बातों में द्धारिका मोड़ स्टेशन भी आ गया और मुझे अब लगने लगा था कि मेरी और मौसी की यह यात्रा बस यहीं तक थी। द्धारिका मोड़ स्टेशन के बाहर मौसी के बड़े भाई किशोरजी और जीजाजी अपनी कार लिए बाहर हमारा इंतज़ार कर रहे थे। मैं यहीं से वापस लौट जाना चाहता था परन्तु किशोर मामाजी ने मुझे घर चलने के लिए और बड़ी मौसी से मिलने के लिए कहा। बड़ी मौसी से मिलना मेरे लिए भी उतना ही आवश्यक था जितना मीरा मौसी के लिए, इसलिए मैं भी उनके साथ उनके घर चला गया। रात भर मैं किशोर मामाजी के साथ उसी कार में सोया और सुबह मौसी से बिना मिले ही वापस आगरा आ गया। हालाँकि मैं मौसी के साथ दिल्ली देखना भी चाहता था कर उसे दिखाना भी परन्तु मेरे लिए इतना ही बहुत था कि आज वो मेरे साथ मेरे मनपसंद शहर और देश की राजधानी में थी।

मीरा मौसी कुछ बच्चों के साथ