KANGRA TEMPLE 2019

नगरकोट धाम में एक रात 


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बैजनाथ पपरोला से एक्सप्रेस ट्रेन द्वारा मैं काँगड़ा पहुँचा, चूँकि यह ट्रेन काँगड़ा मंदिर स्टेशन पर नहीं रूकती है इसलिए मैं पहली बार कांगड़ा स्टेशन पर उतरा। आज हमारे मथुरा और आगरा में लोकसभा के चुनाव भी थे, मेरा नाम अभी भी एनरोलमेंट लिस्ट में नहीं था इसलिए इस छुट्टी को मैंने काँगड़ा में आकर मनाया था। मैंने फेसबुक पर वोट देने  सभी मित्रों बधाई दी और उसके बाद कांगड़ा स्टेशन के सामने जाती हुई एक सड़क पर  चलकर मैं नीचे मुख्य सड़क पर पहुँचा। कुछ ही समय बाद यहाँ काँगड़ा शहर जाने वाली बस आई जिससे मैं कांगड़ा मंदिर जाने वाले मुख्य द्वार पर उतर गया। 

पिछले साल की तुलना में यहाँ मुझे बहुत कुछ बदलाब देखने को मिले। कांगड़ा मंदिर की और जाने वाले रास्ते में अब यात्रियों को बैठने के लिए बेंचें लगा दी गई हैं और पुराने टीनशेड यहाँ से अब हटा दिए गएँ हैं। मैं मंदिर पहुँचा। मंदिर के सामने लगे प्याऊ से हाथमुँह धोकर मंदिर के द्धार पर गया और माँ को प्रणाम किया। इसके बाद मुझे आवश्यकता थी एक कमरा की जिससे मैं यहाँ एक रात ठहर सकूं परन्तु मेरे अकेले होने के कारण मुझे यहाँ कोई कमरा नहीं मिला। आखिरकार बहुत देर तक घूमने के बाद भी जब मुझे कोई कमरा नहीं मिला तो मैं बहुत हताश हो गया और मैंने अपने घर माँ के पास फोन लगाया। 

माँ ने मुझे रात में रुकने के लिए माई जी के घर जाने आदेश दिया। माई जी गद्दी मंदिर के ठीक बराबर में है जहाँ हमारे पूर्वजों की काँगड़ा यात्रा का लेखा जोखा देखने को मिलता है। पिछली बार जब मैं अपनी माँ और पत्नी के साथ यहाँ आया था तब हम यहीं रुके थे। मैं सीधे माई जी के घर पहुँचा, वहां माई जी के बड़े पुत्र ने मुझसे मेरे गाँव का नाम पुछा और बड़े ही प्यार से एक रात रुकने के लिए  उपलब्ध कराया। पूरी रात एक पंखे के नीचे मैं माई जी के बरामदे में पड़े बेड पर सोया। यह मेरे वाकई अनोखी और भावनात्मक बात थी। 

मैंने यहाँ अपनी पत्नी को बहुत याद किया जो पिछले कुछ महीनों से मुझसे दूर अपने मायके में रह रही थी, अभी कल परसों ही तो मैं उससे तलाक लेने के लिए कोर्ट में अर्जी लगाकर आया था, अर्जी लगाने के बाद से ही मेरा मन अशांत था। दिल और दिमाग की लड़ाई में मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि मेरे लिए क्या उचित है और क्या अनुचित। जब मैं कोई निर्णय नहीं ले पाया तो मैं बिना किसी से कुछ कहे सीधे यहाँ चला आया। अभी पिछली साल की बात ही तो थी जब मैं अपनी माँ के साथ पहली बार अपनी पत्नी को अपनी कुलदेवी के दर्शन कराने यहाँ लेकर आया था और उसकी गोद भरने की प्रार्थना करके गया था परन्तु आज मैं अकेला रह गया अपनी पत्नी से दूर रहकर कहीं ना कहीं मेरी जिंदगी अधूरी थी और अब तो बात रिश्ते के ख़त्म होने की कगार पर पहुँच चुकी थी और वो भी सिर्फ मेरी वजह से। इसलिए मैंने देवी माँ से हाथ जोड़कर विनती की, कि हे माँ मुझे सही मार्गदर्शन दो, अपने जीवन में जो करूँ वो सर्वथा सभी के हित में हो और धर्मानुसार हो। 

और काँगड़ा से लौटते समय ही मुझे मेरे सभी प्रश्नों का उत्तर मिल गया और मेरा मन एक दम शांत हो गया। अगले भाग में जानिये। ... 






















        

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