SONPRAYAG


केदारनाथ यात्रा 2019 - हरिद्वार से सोनप्रयाग बस यात्रा



शाम को गंगा स्नान करने  के बाद हम धर्मशाला पहुंचें और अपने अपने घरों से जो कुछ हम खाने को लाये थे उसे ही खाकर अपने बिस्तर लगाकर सो गए।  त्रिपाठी जी धर्मशाला की सबसे  ऊपर की छत पर जाकर सो गए जहाँ इस जून के महीने में भी हमें  ठंडी हवा रात को लगी रही थी। सुबह तड़के ही हम सब उठकर नहाधोकर बस स्टैंड की तरफ निकल गए। बस स्टैंड पहुंचकर देखा तो बद्रीनाथ जाने वाली उत्तराखंड की एकमात्र रोडवेज बस निकल चुकी थी, इसलिए बस स्टैंड के बाहर से ही चलने वाली एक प्राइवेट बस में हमने अपनी अपनी सीट बुक कर लीं। 

सुबह आठ बजे  के आसपास बस हरिद्वार से रवाना हो चली, यह बस अगस्तमुनि तक ही जा रही थी। अगस्तमुनि रुद्रप्रयाग से आगे केदारनाथ जाने वाले मार्ग में पड़ता है। ऋषिकेश निकलने के पश्चात् बस अब पहाड़ों की तरफ अपना रुख कर रही थी। यही वो पहाड़ थे जिनमें जाने का सपना मैं काफी समय से देख रहा था। गोलाकार घुमावदार सड़कों पर बस में बैठकर यात्रा करने का आनंद ही कुछ और होता है, गंगा नदी अब काफी नीचे गहरी घाटी में बहती हुई दिखाई दे रही थी। जितना यहाँ यात्रा करने में आनंद आता है उतना ही बस की खिड़की से गंगा ज की गहरी घाटी को देखकर डर भी लगता है। यह उत्तराखंड के पहाड़ हैं और उत्तराखंड एक देवभूमि है यहां जहाँ कहीं भी नजर जाती है वहीँ ईश्वरीय शक्ति आभास अनायास ही होने लगता है। 

कुछ समय पश्चात बस एक स्थान पर आकर रुकी, यह तीन धारा स्थान कहलाता है, यहाँ बसें कुछ समय के लिए यात्रियों को नाश्ता या भोजन कराने के लिए ठहरती हैं, यहाँ एक ढाबें पर हमने भी कुछ नाश्ता किया और बस द्वारा आगे की तरफ रवाना हो चलें। अगला मुख्य पड़ाव देवप्रयाग था, देवप्रयाग उत्तराखंड का प्रथम प्रयाग है जहाँ बद्रीनाथ जी से आने वाली अलखनंदा और गंगोत्री से आने वाली भागीरथी का संगम होता है और यहीं से यह दोनों नदियाँ आपस में मिलकर गंगा का रूप धारण करती हैं और गंगा कहलाती हैं। देवप्रयाग से चारों धामों में से दो दो धामों के रास्ते अलग अलग होते हैं। एक रास्ता यहाँ से उत्तरकाशी होते हुए गंगोत्री और यमुनोत्री गया है और दूसरा बद्रीनाथ जी और केदारनाथ जी गया है।   

देवप्रयाग के बाद बस कीर्तिनगर होते हुए श्रीनगर पहुंची। यह उत्तराखंड का इस मार्ग पर एक प्रमुख व्यापारिक नगर है, यह पौड़ी जिले का एक संभाग है, यहाँ पौड़ी से आने वाला रास्ता भी मिल जाता है। बस यहाँ काफी देर रुकने के पश्चात आगे अपने गंतव्य को रवाना हो चली, अलखनंदा नदी यहाँ अपने विशालकाय रूप में बहती नजर आ रही थी, और नदी के किनारे किनारे ही बस भी अपनी धीमी रफ़्तार में आगे पहाड़ों की ओर बढ़ती जा रही थी। यहाँ के पहाड़ बलुआ मिटटी और पत्थरों से निर्मित हैं इसलिए कई जगह पहाड़ खिसकते हुए भी यहाँ दिखाई देते हैं अतः यहाँ बरसात के मौसम में यात्रा करना उचित नहीं है। 

कुछ समय पश्चात् हम रुद्रप्रयाग पहुँचे, यह दूसरा मुख्य प्रयाग है जहाँ अलखनंदा में केदारनाथ से आने वाली मन्दाकिनी नदी का संगम होता है और यहीं से श्री बद्रीनाथ जी और केदारनाथ जाने वाले मार्ग अलग अलग हो जाते हैं। अबतक हमारी बस अलखनंदा के किनारे किनारे चलती हुई आ रही थी किन्तु अब जब हम केदारनाथ की तरफ जा रहें हैं तो अब हमारा रास्ता मन्दाकिनी के साथ साथ था, मन्दाकिनी नदी भी यहाँ अपने पूरे वेग के साथ बहती है। रुद्रप्रयाग से निकलने के पश्चात बस अपने आखिरी स्टॉप अगस्तमुनि पहुँची। अगस्तमुनि, महर्षि अगस्त्य के नाम से प्रसिद्ध है और यहाँ उनका एक आश्रम और मंदिर भी स्थापित है। अगस्तमुनि से दूसरी बस से हम अपने आगे के गंतव्य को रवाना हो चले। यहाँ हाइवे बनाने का काम जोरों पर चल रहा है इसलिए यहाँ से एक रास्ता मन्दाकिनी नदी में से होकर बनाया गया था, इस प्रकार हमने मन्दाकिनी नदी में भी अपनी यात्रा पूर्ण की।

अब मौसम खराब हो चला था, शाम भी करीब ही थी। आसमान घने काले बादलों से घिरा हुआ था और आकाशीय बिजली इतनी जोर से गड़गड़ाहट के साथ चमक रही थी कि जैसे अभी हमारे ऊपर ही गिर पड़ेगी। थोड़ा और आगे बढे तो जोरदार बारिश ने हमारा जमकर स्वागत किया। बारिश इतनी तेज थी कि अब बाहर का कुछ भी दिखना बंद हो चुका था, सिर्फ पहाड़ और जंगल और ये जोरदार तेज बारिश। कसम से मैंने प्रकृति का इतना भयानक रूप पहले कभी नहीं देखा था। अभी गाड़ी केवल चार बजा रही थी और बहार देखने पर ऐसा लग रहा था कि दिन कहीं छुप सा गया हो। सूर्यदेव कहाँ थे पता ही नहीं था क्योंकि इस समय आकाश पर सूर्यदेव का नहीं, मेघराज का आधिपत्य था।  

भरी बरसात के बीच हमारी बस एक जाम के बीच आकर खड़ी हो गई, मैंने बस से उतरकर देखा तो बहुत ही लम्बा जाम लगा हुआ था, कई घंटे खड़े रहने के बाद बस थोड़ी से आगे बढ़ी। बस की सभी सवारियों को भूख लगी हुई थी, यह बस बद्रीनाथ से आई थी और केदारनाथ के लिए सोनप्रयाग तक जा रही थी। आगे जाम में मेरी नजर एक भंडारे पर पड़ी यहाँ शानदार भंडारा चल रहा था। सब्जी पूड़ी, दाल चावल और जलेबी का शानदार डिनर करने के बाद में बस में वापस आ गया। यह स्थान रामपुर था इससे ऊपर ही सोनप्रयाग है। जाम के बीच चलते हुए आखिरकार हम सोनप्रयाग पहुँच ही गए। 

सोनप्रयाग में मन्दाकिनी नदी में वासुकिगंगा का संगम होता है। इसलिए मेरी इस यात्रा में यह तीसरा प्रयाग है। 
बस ने तो हमें घर से इतनी दूर पहाड़ों में लाकर उतार दिया जहां जोरो से ठंडी हवा चल रही थी और बारिश के आने की प्रबल सम्भावना थी। यहाँ आये हुए समस्त यात्री जिन्हें जहां कहीं भी जगह मिली वहीँ लेट गए। यहाँ किसी भी होटल या लॉज में कहीं भी जगह खाली नहीं थी। यहाँ मुझे ओयो रूम की बड़ी याद आई जो पूरे देश के बड़े छोटे सभी शहरों में आसानी से हमारे लिए सस्ते और अच्छे रूम की व्यवस्था कर देता है। यहाँ ओयो का खिन कोई नाम नहीं था। एक चाय की दुकान पर बैठकर हम रात को ठहरने का विचार कर रहे थे और ठंडी हवाओं के बीच गर्मागर्म चाय की चुस्कियां लिए जा रहे थे। 

त्रिपाठीजी और विष्णुभाई ने भी समस्त सोनप्रयाग घूम कर देख लिया किन्तु कहीं कोई कमरा हमें एकरात रुकने के लिए नहीं मिला। मेरी नजरें कुछ ऐसा तलाश कर लेती हैं कि काम भी हो जाए और खर्चा भी ना हो। मैं थोड़ा सा ऊपर की तरफ गया तो मुझे यहाँ एसबीआई का एक एटीएम दिखा जिसके बाहर का बरामदा बिलकुल खाली था। हमें यही तो चाहिए था की बस सोने के लिए ऊपर छत मिल जाते, भला बेड और तकिये से ही थोड़े ही रात गुजरती है। छत हमें मिल चुकी थी। घर लाई गईं चादरें हमारे लिए अब हमारा बेड थीं, और हमारे बैग हमारा तकिया। यह एटीएम एक होटल के नीचे उसके कमरों के बराबर एक कोने  में बना हुआ था। सुबह जब वो कमरे  खाली हुए तो हमने उन्हीं कमरों के बाथरूमों को अपने प्रयोग में लिया और नित्यक्रिया से निर्वृत्त होकर नहाधोकर अपने आगे की यात्रा की तैयारी की। 

हरिद्वार 

हरिद्वार 

हरिद्वार 

तीनधारा  

















      

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