KANGRA EXPRESS



काँगड़ा वैली एक्सप्रेस से एक सफ़र 



अभी हाल ही में दिनांक 6 फरवरी से काँगड़ा वैली रूट पर एक एक्सप्रेस ट्रेन का संचालन किया गया है। यह काफी लम्बा समय था जब इस 164 किमी लम्बे रूट पर कोई एक्सप्रेस ट्रेन चली है। हालाँकि यह अभी पठानकोट से बैजनाथ पपरोला तक ही अपनी सेवा देती है। परन्तु इस 141 किमी लम्बी यात्रा को एक एक्सप्रेस ट्रेन द्वारा पूरा करना कम रोमांचकारी नहीं है। पठानकोट से चलने के बाद इसका अगला स्टॉप ज्वालामुखी रोड स्टेशन पर है। इस बीच में अनेकों छोटे छोटे स्टेशन आते हैं और जब यह ट्रेन उन स्टेशन पर बिना रुके गुजरती है तो उसके आनंद का एहसास केवल उसे ही हो सकता है जिसने इस ट्रेन में बैठकर यात्रा की हो। 


जब से इस ट्रेन के चलने के खबर मैंने सुनी तो मेरा मन बहुत बैचैन हो उठा था इस ट्रेन में एक बार यात्रा करने के लिए। मैं बचपन से ही अपने माता पिता के साथ इस रुट पर यात्रा करता रहा हूँ क्योंकि यहाँ हमारी कुलदेवी माता श्री बज्रेश्वरी देवी जी का स्थान है जो नगरकोट वाली देवी के नाम से विख्यात हैं और काँगड़ा धाम में विराजमान हैं और उनके साथ ही माता चामुंडा देवी, माँ ज्वालादेवी और माँ चिंतपूर्णी के दर्शन यहाँ किये  जा सकते हैं। अब से पहले केवल इस रेलवे लाइन पर पैसेंजर ट्रेनों का ही संचालन होता था जो पठानकोट से काँगड़ा तक की दूरी तय करने में 6 से 7 घंटे का समय लगाती थीं और हर छोटे छोटे स्टेशनों पर रुकते हुए गुजरती थीं। 
इसलिए मेरा अबकी बार प्लान था इस एक्सप्रेस ट्रेन में एक यात्रा की जाए। 

मैं ऑफिस से शाम को घर लौटा और अपनी माँ का आशीर्वाद लेकर पहली बार काँगड़ा के लिए अकेला रवाना हो गया। मेरी पत्नी पिछले काफी लम्बे समय से मेरे साथ नहीं थी इसलिए मेरा मन उसकी तरफ से भी कहीं ना कहीं बहुत दुखी था और अब मैं अपने मन की शांति के लिए ऐसे स्थान पर जाना चाहता था जहाँ मुझे मेरी समस्या का निवारण मिल सके और उचित मार्गदर्शन प्राप्त हो सके। इसके लिए मुझे काँगड़ा से बेहतर कोई भी स्थान नहीं लगा। 

मैंने जल्द ही मथुरा स्टेशन पहुँचा और बाइक को स्टैंड पर खड़ी कर पठानकोट की एक टिकट ली। प्लेटफॉर्म पर जैसे ही पहुँचा तो कोटा से ऊधमपुर जाने वाली ट्रेन तैयार खड़ी हुई थी। अब इसके कोच बदल दिए गए हैं अब यह नीली से लाल हो गई है और एकदम राजधानी एक्सप्रेस की तरह दिखती है। मैं अभी आगे जनरल कोच तक पहुँचा भी नहीं था कि ट्रेन सीटी दी और रवाना हो चली। मैं जल्दी जल्दी में स्लीपर कोच में चढ़ गया। यह कोच बिलकुल खाली पड़ा हुआ था इसीलिए इसी में ही बिस्तर जमाया और सो गया। रात को दिल्ली निकलने के बाद TTE महोदय आये भी थे पर बिना कुछ कहे आगे चले गए और मैं सोता ही रहा। 

 सुबह जब आँख खुली तो देखा ट्रेन लुधियाना स्टेशन पर खड़ी हुई थी, यहाँ मुझे अपने यहाँ से ज्यादा ठंड सी महसूस हुई, मैंने एक कप चाय पी और वापस अपनी सीट पर आकर बैठ गया, ट्रेन अभी भी पूरी कि पूरी खाली ही पड़ी थी। हमारी ट्रेन के ठीक आगे आगे धौलाधार एक्सप्रेस चल रही थी गर यह पीछे होती तो मेरा काम बन जाता क्योंकि यह सीधे पठानकोट जंक्शन पहुँचती और जबकि हमारी ट्रेन हमें पठानकोट कैंट उतारकर जम्मू चली जाती। मुझे जो काँगड़ा एक्सप्रेस पकड़नी थी उसका टाइम पठानकोट जंक्शन से 9:20 बजे था। कहीं ये ट्रेन  निकल गई तो यात्रा का आधा आनंद समाप्त हो जायेगा। 

सही 8:20 पर ट्रेन ने मुझे पठानकोट कैंट उतार दिया। मैं शीध्र ही स्टेशन बाहर निकला और पठानकोट जंक्शन जाने के लिए ऑटो का इंतज़ार करने लगा। एक सब्जी से भरा हुआ ऑटो आया जिसे एक बाबा चला रहे थे, मैंने उनसे प्रार्थना की कि मुझे कांगड़ा वाली ट्रेन पकड़नी है तो उन्होंने मुझे एक मुख्य चौराहे तक लाकर छोड़ दिया और मैं वहां से दूसरा ऑटो पकड़कर पठानकोट छोटी लाइन पहुँच गया। 

काँगड़ा वैली एक्सप्रेस चलने लिए तैयार खड़ी हुई थी, यह मात्र चार कोच वाली ट्रेन है जिसपर काँगड़ा के  दर्शनीय स्थलों की पेंटिंग्स बनी हुई थीं। इसमें दो कोच सामान्य थे एक कोच द्धितीय श्रेणी का था तथा एक कोच शताब्दी एक्सप्रेस की तरह चेयर कार का था। मैं द्धितीय श्रेणी के कोच में सवार हुआ और ट्रेन पठानकोट से रवाना हो चली। बड़ा ही आनंद आया जब ट्रेन नूरपुर रोड को बिना रुके पार कर गई। डलहौजी रोड पर एक ट्रेन के साथ इसका क्रॉस भी हुआ और उसे भी इस ट्रेन ने बिना रुके पार कर लिया।  

इसी प्रकार जवां वाला शहर, हरसर देहरी, नगरोटा सुरियाँ, गुलेर आदि सभी बिना रुके पार हुए और अंत में ट्रेन ज्वालामुखी रोड पर 2 मिनट के लिए रुकी। अगला स्टॉप अब काँगड़ा था। माता के दर्शन को आने वाले अधिकतर भक्त काँगड़ा नहीं उतरते बल्कि इससे अगले स्टेशन काँगड़ा मंदिर पर उतरते हैं परन्तु जब यह ट्रेन काँगड़ा मंदिर को बिना रुके पार कर गई तो वो लोग इस ट्रेन को दोष देने लगे और अंत में आगे जाकर नगरोटा पर उतरे जो इस ट्रेन का तीसरा स्टॉप था। 

नगरोटा के बाद मेरा पसंदीदा स्टेशन चामुंडा मार्ग था जो वृत्ताकार में बना हुआ है, ट्रेन पलक झपकते ही इसे  पार गई और अपने चौथे स्टॉप यानी पालमपुर पहुँची। यह इस रेलमार्ग का सबसे सुन्दर और प्राकृतिक वातावरण से भरपुर स्टेशन है। इसके बाद यह ट्रेन अपने पांचवे और आखिरी स्टॉप पर पहुँची बैजनाथ पपरोला। अब यह यहाँ से चार बजे वापस पठानकोट के लिए प्रस्थान करेगी। 

लुधियाना स्टेशन पर एक सुबह 

लुधियाना जंक्शन 

कोटा ऊधमपुर एक्सप्रेस 

पठानकोट से पहले हिमाचल प्रदेश  

पठानकोट छोटी लाइन पर एकमात्र बिकने वाले छोले भटूरे   

पठानकोट छोटी लाइन का स्टेशन 

पठानकोट जंक्शन 

रास्ते म एक नदी 

नूरपुर रोड से गुजरती ट्रेन 



जवां वाला शहर भी बिना रुके ही पार हुआ 


हरसर देहरी भी 

दूर दिखाई देती धौलाधार श्रेणी  




गुलेर रेलवे स्टेशन 



ज्वालामुखी स्टेशन के सामने लिखी ये लाइन मैं बचपन से पढता आ रहा हूँ। 

ज्वालामुखी रोड रेलवे स्टेशन 


ज्वालामुखी से काँगड़ा वाला रोड 

हमारा हिमाचल 

एक रेलवे संयंत्र 



काँगड़ा रेलवे स्टेशन 

काँगड़ा का एक दृश्य 



बाणगंगा नदी 

माँ भगवती का धाम - काँगड़ा मंदिर 





अपना धौलाधार और हिमाचल 

नगरोटा स्टेशन 

नगरोटा पर काँगड़ा वैली एक्सप्रेस 




सुलाह रेलवे स्टेशन 




खूबसूरत रेलवे स्टेशन पालमपुर 

ट्रेन पर लगी बैजनाथ मंदिर की एक पेंटिंग्स 

काँगड़ा मंदिर की तस्वीर  


इस प्लेटफॉर्म की सफेदी के आगे रिन, सर्फ़ एक्सल, टाइड सब फ़ैल हैं 






आखिरी स्टॉप - बैजनाथ पपरोला 







 अगली यात्रा - बैजनाथ मंदिर । 

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