हिम की तलाश में - मनाली यात्रा


  हिम की तलाश में - मनाली यात्रा 


सहयात्री - शारुख खान 

       आज पूरा देश नए साल के जश्न में खुश था, परन्तु मैं कहीं ना कहीं दिल से बहुत दुखी था। पिछले महीने मैंने अपने आप को पूरे माह काम में व्यस्त रखा परन्तु अब मैं थक चुका था शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी। इसलिए मैं कहीं दूर जाना चाहता था, एक ऐसी जगह जहाँ जाकर मैं अपनी रोजाना दौड़ भाग वाली जिंदगी को कुछ समय के लिए भूल जाऊँ, मुझे निजी जिंदगी की भी तकलीफ को कुछ समय के लिए अपने  दिमाग से दूर करना था, कुल मिलाकर मैं अपने दिल और दिमाग दोनों को फ्रेश करना चाहता था इसलिए मुझे एक ऐसी जगह की तलाश थी जहाँ मुझे पूर्णरूपेण शांति मिल सके इसलिए मेरे मन में इसबार हिमालय का खयाल आया। मैंने अपनी जिंदगी में कभी बर्फ पड़ते हुए नहीं देखी थी इसलिए मैंने शिमला जाने का विचार बनाया।


       मौसम विभाग की रिपोर्ट के अनुसार अभी शिमला में बर्फ नहीं थी और गर थी भी, तो वो ऊँचे इलाकों में थी।  मैं पहले भी शिमला जा चुका हूँ। इसलिए शिमला का प्लान कैंसिल करके मनाली का प्लान बनाया जहाँ इसवक्त बेशुमार बर्फ पड़  रही थी। ऑफिस से तीन दिन की छुट्टी लेकर और माँ का आशीर्वाद लेकर आज नई साल के पहले दिन मैं मथुरा जंक्शन स्टेशन पहुँचा। यहाँ मेरा दोस्त शारुख भी मुझे मिल गया जो मेरे साथ इस यात्रा में मेरा सहयात्री था। 

      कुछ समय बाद जब कोंगु एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म पर पहुँची तो हमने जनरल कोच में अपनी सीट ग्रहण की। मैं अभी सीट पर बैठा ही था कि ट्रेन मथुरा से प्रस्थान करने लगी और लेड़ीजों का एक झुण्ड हमारी सीटों के पास आकर खड़ा हो गया और पैनी नज़रों से बैठने के लिए इधर उधर सीटें तलाश करने लगा। हर जनरल कोच के आगे और ट्रेन के अंत में सरकार ने लेड़ीजों के लिए अलग कोच की व्यवस्था की है परन्तु ना जाने क्यों फिर भी ये लेडीज इन कोचों में ना बैठकर सार्वजानिक कोच में ही बैठना पसंद करती हैं। जब कुछ लेडीजों को जगह मिल गई और कुछ खड़ी रह गई तो मेरा बैठे रहना मुश्किल हो गया। किसी स्त्री या बुजुर्ग को अपने समक्ष खड़े यात्रा करते देख मेरा मन मुझे बैठ कर यात्रा नहीं करने देता और ना चाहते हुए भी मैंने उस जनरल कोच की खिड़की वाली सीट को छोड़कर दिल्ली तक खड़े होकर यात्रा की। मेरे दिल में अपनी सीट को छोड़ने का दुःख उसवक्त समाप्त हो गया जब मेरी सीट पर बैठने वाली लड़की ने मुझसे कहा धन्यवाद भैया।

       मैं और शारुख निजामुद्दीन पहुंचे, अब हमें यहाँ से नई दिल्ली जाना पड़ेगा और इसके लिए हमें प्रतीक्षा थी नई दिल्ली जाने वाली केरला एक्सप्रेस की जो कुछ ही समय में निजामुद्दीन पहुँच रही थी, तब तक हम दोनों ने घर से लाई गई पूड़ी और सब्जी खाकर अपना पेट भी भर लिया और केरला एक्सप्रेस द्वारा नई दिल्ली पहुँचे। बाहर निकलकर हम मेट्रो से कश्मीरी गेट पहुँचे और यहाँ मैंने पहली बार दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे कश्मीरी गेट को देखा। यूँ तो कश्मीरी गेट कई बार आया था परन्तु मुझे इस बस अड्डे की आजतक जरुरत नहीं पड़ी थी इसलिए यहाँ नहीं आया था। यहाँ हमने मनाली जाने वाली हिमाचल प्रदेश की सामान्य बस की दो टिकट खरीदी और बस में अपना स्थान ग्रहण किया। अपने निर्धारित समय पर बस मनाली की ओर रवाना हो गई। काफी समय दिल्ली में चलने के बाद आख़िरकार बस रात को चण्डीगढ़ पहुंची।

   चंडीगढ़ से प्रस्थान करने के बाद मैं बस में सो गया और जब जगा तो देखा बस किसी ढ़ाबे पर खड़ी हुई है और घड़ी में सुबह के चार बजे थे। मैं बस से बाहर निकला तो ठण्ड से ठिठुर गया, रात के अँधेरे में भी मुझे ऊँचे ऊँचे पहाड़ दिखाई दे रहे थे, मैं जल्दी से होटल के अंदर गया और एक गर्मागर्म चाय पी। बस के ड्राइवर और कंडक्टर महोदय भी अंगीठी पर हाथ सेकते हुए चाय पी रहे थे। मेरे चाय पीने के बाद मेरे पेट ने गड़गड़ाहट करना शुरू कर दिया और मैं कंडक्टर से कहकर होटल से नीचे बने बाथरूम में नित्यक्रिया से निर्वृत्त होने चला गया। मैं वापस लौटा तो मेरे पैरों तले उस वक़्त जमीन खिसक गई जब मेरी बस मेरी आँखों के सामने मुझे उन पहाड़ों के अंधेरों में, जनवरी के भयानक सर्दी में सुबह चार बजे अकेला छोड़ गई। 

      मैं थोड़ी देर के लिए तो घबरा गया परन्तु शीघ्र ही मुझे याद आया कि उस बस में मेरा दोस्त भी था शारुख, जो मेरे बस से उतरते वक़्त गहरी नींद में सोया हुआ था। मैंने जल्दी से उसे फोन लगाया परन्तु काफी देर तक जब उसने फोन नहीं उठाया तो मैं अब बस के रुकने और मिलने की उम्मीद खो चुका था। मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था मैं शारुख को फोन करता ही रहा और अंत में आख़िरकार उसकी नींद टूटी और उसने मेरा फोन रिसीव किया, जब मैंने उसे बताया कि मैं बस में नहीं हूँ, पीछे रह गया हूँ तो उसने तुरंत बस को रुकवाया और ड्राईवर से मेरी बात करवाई, ड्राईवर ने होटल वाले से बात की और होटल वाले ने मुझे आगे की तरफ जा रहे एक ट्रक में बैठाया। कुछ ही देर बाद मुझे मेरी बस खड़ी हुई नजर आई और आख़िरकार शारुख और बस को पाकर मैंने राहत की साँस ली। इस बस की अधिकतर सवारियाँ दूसरी बस से आगे जा चुकी थी जो हमें मंडी के बस स्टैंड पर खड़ी हुई मिली। फिर इसी बस से हम भी मनाली की तरफ रवाना हुए। मंडी के बस स्टैंड पर पहुँचकर हम भी उसी बस में बैठे जिसमे हमारी बस की सवारियाँ पहले से बैठी हुईं थीं और जिस बस से हम दिल्ली से चले थे वो खाली ही मंडी पर खड़ी रह गई। 

      सुबह के समय मेरी जब आँख खुली तो मैंने खुद को कुल्लू में पाया। कुल्लू के स्टैंड में कुछ देर खड़ी रहने के बाद अब बस मनाली की तरफ रवाना हो चली थी। व्यास नदी के सड़क पर काफी देर तक चलने के बाद बस मनाली के बस स्टैंड पहुंची और मैं भी पहली बार मनाली पहुँचा। बस स्टैंड पर बर्फ से ढके पहाड़ों का नजारा देखकर मैं आश्चर्य चकित था। चायपानी पीने के बाद मैं और शारुख मनाली बाजार को घूमने निकल गए जहाँ शारुख ने अपने लिए कुल्लू मनाली लिखा हुआ एक गर्म टोपा खरीदा। हमें सोलंग वैली देखने जाना था इसलिए हमने एक टैक्सी किराये पर ली, टैक्सी वाले लड़के ने बताया कि हिडिम्बा मंदिर का रास्ता तो अभी बंद है इसलिए हम सोलंग वैली की तरफ निकल पड़े। आगे जाकर टैक्सी वाले ने अपनी कार एक दुकान के सामने खड़ी की और कहा बर्फ में जाने से पहले कुछ गर्म कपडे यहाँ किराये पर मिलते हैं वो ले लो अन्यथा आप बीमार हो जाओगे, मैं ये वस्त्र लेना नहीं चाहता किन्तु शारुख ने ले लिए इसलिए मजबूरन मुझे भी लेने पड़े।  

   अब हम आगे बढे तो गाड़ियों की लाइन लगी हुई थी, ये सभी लोग नई साल पर एंजॉय करने सोलंग वैली घूमने आये हुए थे किन्तु अत्यधिक बर्फ़बारी के कारण सोलंग वैली का रास्ता बंद था इसलिए टैक्सी वाला हमें अपने गांव कोठी की तरफ ले गया। यह एक दम शांत क्षेत्र था, यहाँ भीड़भाड़ का कोई नाम नहीं था। कोठी रोहतांग जाने वाले रास्ते में ही पड़ता है। हर तरफ सिर्फ बर्फ ही बर्फ दिखाई दे रही थी और यहीं मैंने सेबों के बाग़ देखे और बर्फ भी पहली बार गिरती हुई देखी। मुझे और शारुख को ये स्थान कुलमिलाकर बहुत ही शानदार लगा। सारे दिन बर्फ के साथ खेलने के बाद हम वापस मनाली की तरफ रवाना हुए और बस स्टैंड के नजदीक टैक्सी वाला हमें उतार गया। शाम को हमें परेशानी तब हुई जब मनाली से दिल्ली जाने के हमें कोई बस नहीं मिली और इधर मौसम अत्यधिक ठंडा होता जा रहा था। आखिरकार बहुत देर बाद हमें पंजाब रोडवेज की एक बस मिली जो चंडीगढ़ तक जा रही थी, बिना देर किये हमने इस बस में अपनी सीट ग्रहण की और कुछ समय बाद देखते ही देखते यह बस फुल हो गई और हम मनाली से चल पड़े।

     सुबह चार बजे बस ने हमें चंडीगढ़ के बस स्टैंड पर उतार दिया, यहाँ से सिटी बस से हम चंडीगढ़ के दुसरे बस स्टैंड पहुंचे जहाँ से हमें अम्बाला जाने के लिए हरियाणा रोडवेज की बस मिली और कुछ समय बाद हम अम्बाला रेलवे स्टेशन पर थे परन्तु अफ़सोस मथुरा जाने वाली हीराकुंड एक्सप्रेस हमारे सामने ही छूट गई और एक शटल द्वारा हम पानीपत पहुंचे, हालाँकि ये शटल भी दिल्ली जा रही थी परन्तु हम झेलम एक्सप्रेस को निकलने देना नहीं  चाहते थे। कुछ समय बाद झेलम एक्सप्रेस आई और हम दिल्ली पहुंचे। शारुख यहाँ से झेलम के जनरल डिब्बे में चला गया और मैं पास मैं खड़ी हुई केरला एक्सप्रेस के रिजर्वेशन कोच में।     

मैं और शारुख मथुरा जंक्शन पर 



सुबह सुबह मनाली में 

 मनाली बस स्टैंड 








सेबों के बागान 

कोठी स्थित होटल 
   


व्यास नदी 


टैक्सी वाला ड्राइवर 

सोलांग के रास्ते में 



























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