Saturday, September 1, 2018

RANTHAMBHORE FORT


रणथंभौर किला 


पिछली यात्रा - शिवाड़ दुर्ग और बारहवाँ ज्योतिर्लिंग 

      शिवाड़ से लौटने के बाद मैं सवाई माधोपुर स्टेशन पहुंचा और यहाँ से बाहर निकलकर मैंने तलाश की  रणथम्भौर जाने वाले किसी साधन की। एक दुकान पर मैंने अपनी शेव बनवाई और उसी दुकानदार से रणथम्भौर जाने वाली बस के बारे में पूछा तो दुकानदार ने थोड़ा आगे की तरफ इशारा करते हुए कहा कि वो सामने जीपें खड़ी हैं वही रणथम्भौर जाती हैं। मैं इन जीपों तक पहुँचा तो जीप वाले ने कहा जैसे ही कुछ सवारियाँ और आजायेंगी तभी हम चल पड़ेंगे। जबतक मैं अपनी प्रिय कोल्ड्रिंक थम्सअप लेने गया तब तक काफी सवारियां जीप वाले के पास आ चुकी थी। मैंने अपना बैग पहले ही जीप की आगे वाली सीट पर रख दिया था इसलिए वहां कोई नहीं बैठा और हम रवाना हो गए ऐतिहासिक महादुर्ग रणथम्भौर की ओर। 


      सवाई माधोपुर शहर की सीमा समाप्त होने के बाद जंगली रास्ता प्रारम्भ हो गया, यह रणथम्भौर टाइगर रिज़र्व स्थान है यहाँ टाइगर के अलावा अनेकों जीवजंतु देखे जा सकते हैं। फ़िलहाल बरसात के दिन थे इसलिए टाइगर रिज़र्व अभी बंद था और अक्टूबर के माह में खुलेगा मतलब एक महीने बाद। यहाँ चारों तरफ घोर जंगल ही जंगल है, किला अभी दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा था। बरसात के दिन थे इसलिए जंगल में जगह जगह पानी के झरने बहते हुए दिखाई दे रहे थे परन्तु कोई शेर नजर नहीं आ रहा था पता नहीं बरसात के दिनों में ये शेर कहाँ गायब हो जाते हैं। कुछ समय बाद हम घने जंगल के बीचोंबीच पहाड़ों में स्थित रणथम्भोर के दुर्ग पर पहुंचे। यहाँ काफी भीड़ थी जो किले में स्थित गणेश जी के मंदिर पर दर्शन हेतु यहाँ पधारे थे। 

      रण और थंभ नामक पहाड़ियों के बीच समुद्र तल से लगभग 481 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रणथम्भौर किला 12 किमी की परिधि में बना हुआ है। इसके तीनों तरफ गहरी खाई है जो इसे अजेय बनाती है परन्तु हिंदुस्तान पर शासन करने वाले बड़े बड़े और महान शासकों को इसने फतह करने में बड़ी परेशानी दी थी। अधिकतर शासक इस किले का महीनों तक घेरा करके डाले रहते थे और इस खाई को पार करने की योजना बनाते रहते थे। इतिहास के अनुसार इस किले का निर्माण चौहान वंश के राजा सपलाक्ष ने 944 ईस्वीं में किया। 1192 ईस्वीं में तराइन के मैदान में पृथ्वीराज चौहान के हारने के बाद उनके पुत्र गोविन्द राज ने इसे अपनी राजधानी बनाया। 

      गोविंदराज के बाद अनेकों शासकों ने इस किले पर राज किया किन्तु इस किले का स्वर्णिम युग हम्मीरदेव के शासनकाल को ही माना जाता है। हम्मीरदेव चौहान ने सन 1282 से 1301 ईस्वीं तक यहाँ शासन किया। उनका ये 19 वर्षों का शासनकाल ही रणथम्भौर का स्वर्णिम काल कहलाता है। इसके बाद यह किला मेवाड़ के महाराणाओं के अधीन रहा। हम्मीरदेव के शासक काल में ही अलाउद्दीन ख़िलजी ने इस किले पर आक्रमण किया और इसे लूट कर नष्ट भ्र्ष्ट कर दिया और वापस दिल्ली लौट गया। इसके बाद इस किले पर दिल्ली के सुल्तानों का राज हो गया। सन 1527 में खानवा के मैदान में बाबर के द्वारा युद्ध में घायल महाराणा सांगा को इस किले में लाया गया और यहीं उनका उपचार हुआ तत्पश्चात इस किले की सत्ता मेवाड़ के शासकों के हाथों में आ गई और फिर से यह मुगलों के अधीन हो गया। 

     धीमी धीमी फुहारों के बीच में किले के एक एक भाग को देखते हुए आगे बढ़ता ही जा रहा था, किले के खंडहरों को देखकर लगता है कि किसी समय में यह कितना भव्य और विशाल रहा होगा, एक पूरा नगर इसमें समाया हुआ है जब यहाँ जीवन होता होगा उस समय की कल्पना ही अलग होगी। अनेकों मंदिर जो आज क्षतिग्रस्त है, बाग़बानी और चारों तरफ फैला विशाल हरा भरा जंगल। यहाँ एक दरगाह भी स्थित है जिसे देखकर लगता है कि दिल्ली के सुल्तानों के साथ कोई प्रसिद्ध मुस्लिम संत भी यहाँ आये होंगे और यहीं के रहकर रह गए होंगे और रहें भी क्यों ना ये स्थान ही ऐसा है कि यहाँ एकबार आने के बाद शायद किसी का लौटने का मन करे। 

यह किला अपनी विशालता और सुंदरता की वजह से ही विश्व विरासत धरोहर के रूप में यूनेस्को की सूची में दर्ज है। अंत में गणेश मंदिर देखने के बाद मैं वापस सवाई माधोपुर लौट आया। शाम को रतलाम से मथुरा जाने वाली ईमयू से वापस मथुरा आ गया।

किला  ए रणथम्भौर 

रणथम्भौर किला 

रणथम्भौर दुर्ग 




रणथम्भौर किले का इतिहास 



नौलखा पोल 




रणथम्भौर का एक वासी 


हाथी पोल 


किले का नक्शा 








प्राचीन खंडहर 



दरगाह 

रणथम्भौर  में एक दरगाह 

दरगाह काजी पीर जनाव 




शाही तालाव 



शाही तालाव में स्नान करना खतरनाक है 


बत्तीस खम्भों की छतरी 


राज मंदिर 


राज मंदिर 

राज मंदिर 





पाताली देवी मंदिर 


 पदमावती तालाव 










सातपोल 

सातपोल 









एक मकबरा 





रणथम्भौर किले में सुधीर उपाध्याय 

त्रिनेत्र गणेश मंदिर 




रणथम्भौर रेलवे स्टेशन 
 
धन्यवाद 

4 comments:

  1. वाह आपका प्रिय पेय कोल्डड्रिंक मेरा तो चाय है....रणथंभोर क़िले का बढ़िया वर्णन...जो गणेश मंदिर आपने दर्शन किये वो त्रिनेत्र गणेश मंदिर है शायद..

    ReplyDelete
  2. बहुत बढ़िया जानकारी दी है...... किले के अंदर मन्दिर के पिछले भाग से जाने पर लगभग 3 km दूर जंगल मे भगवान शंकर का शानदार मन्दिर है..... लेकिन वहां बिना जानकारी के नही जाया जा सकता

    ReplyDelete