AMB ANDOURA


अम्ब अंदौरा स्टेशन पर एक रात 


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        हम चिंतपूर्णी से लौटने में काफी लेट हो गए थे। हमारा रिजर्वेशन अम्ब अंदौरा स्टेशन से दिल्ली तक हिमाचल एक्सप्रेस में था जिसका छूटने का समय रात आठ बजकर दस मिनट था जबकि हमें सात तो चिंतपूर्णी में ही बज चुके थे।  पर कहा जाता है कि उम्मीद पर ही दुनिया कायम है, मेरी उम्मीद अभी ख़त्म नहीं हुई थी। मैंने एक टैक्सी किराये पर की और अम्ब के लिए निकल पड़ा। हालाँकि रात के समय में पहाड़ी रास्तों पर टैक्सी वाले ने गाडी खूब तेज चलाई और आठ बजकर दस मिनट पर हमें अब स्टेशन लाकर रख दिया। हमारी ट्रेन हमारी आँखों के सामने सही समय पर छूट चुकी थी और अब हमारे पास इस वीरान स्टेशन पर रुकने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। टैक्सी वाला भी अब तक जा चुका था। अम्ब अंदौरा स्टेशन शहर से काफी दूर एकांत जगह में बना हुआ है। यहाँ आसपास कोई बाजार नहीं था, बस स्टेशन के बाहर दो तीन दुकानें थी जिनका भी बंद होने का समय हो चला था। 


        मुझे और मेरे सहयात्रियों को काफी भूख भी लगी थी, इन्ही दुकानों से कुछ पकौड़े लेकर सभी ने खाये परन्तु मैं अब भोजन ही करना चाहता था। एक आखिरी दुकान बंद होने ही वाली थी मैं उनकी दुकान पर पहुंचा , यह दुकान नाश्ता और भोजन की ही थी परन्तु आखिरी ट्रेन के चले जाने के बाद बंद होने ही वाली थी। यहाँ एक भैया थे जब उन्होंने देखा कि हमारी ट्रेन निकल चुकी है और हम भूखे भी हैं तो उन्होंने अपनी माँ से हमारे लिए खाना बनाने को कहा और इसके बाद उन्होंने हमारे लिए गर्मागर्म दाल और रोटी लाकर दी। कल्पना और बुआ जी को मैं उसी दुकान पर खाना खिला लाया था जबकि माँ स्टेशन पर थी तो उनके लिए पैक करा लाया। हमारे सामने एक डीएमयू खड़ी हुई थी जो चंडीगढ़ के लिए सुबह छह बजे प्रस्थान करेगी। स्टेशन पर ही हम सभी अपनी चादर बिछाकर सो गए।  

          सुबह तीन बजे से ही यात्रियों का यहाँ आना शुरू हो गया और देखते ही देखते कुछ घंटो पहले खाली पड़ी डीएमयू ट्रेन अब फुल भरने की कगार पर थी, यहाँ अधिकतर यात्रियों में सभी पंजाबी ( सिख ) ही थे। इन लोगो की खासियत होती है कि ये एकबार ट्रेन में सीट पर अपना कब्ज़ा जमा लें तो मजाले किसी को तनिक भी जगह दे दें।  मैं इनकी इस आदत से भली भांति परिचित था, हालांकि ट्रेन को अभी चलने में काफी वक़्त था परन्तु जिस तरह से ट्रेन पर पंजाबियों का कब्ज़ा होना शुरू हो गया था उससे यही लगता था कि हमें सीट तो दूर की बात खड़े होने की भी जगह नहीं मिलेगी। 

        मैंने अपने सभी साथियों को जगाया और ट्रेन में अपनी सीट घेरने को कहा। अभी तीन ही बजे थे और ट्रेन में सरदार अलग अलग सीटों पर सोये हुए पड़े थे। मैंने किसी भी सरदार से कुछ भी आनाकानी नहीं की, और तसल्ली के साथ मुझे और मेरे सहयात्रिओं को भी आराम से खाली सीटें मिल चुकी थीं। सुबह छः बजे तक तो ट्रेन ऐसे भर गई जैसे कहीं दूर से आई है। सरदार सिर्फ एक मौके की तलाश में थे कि कैसे भी कोई सीट खाली हो जाए और हम उसपर अपना स्थान जमा सकें। पर अफ़सोस उनकी यह हसरत चंडीगढ़ तक पूरी नहीं हुई। हालांकि यह ट्रैन चंडीगढ़ से अम्बाला के लिए भी जाती है पर मुझे इससे अम्बाला नहीं जाना था। चंडीगढ़ जयपुर एक्सप्रेस का समय भी हो चला था और मुझे इस ट्रेन से कुरुक्षेत्र तक जाना था। कुरुक्षेत्र से हम गीता जयंती एक्सप्रेस से मथुरा की ओर रवाना हो गए। रात को नौ बजे के आसपास हम मथुरा उतर गए। इसी के साथ हमारी इस वर्ष की काँगड़ा यात्रा भी सफलतापूर्वक पूरी हुई। 

अम्ब अंदौरा स्टेशन पर एक रात 

रात्रि के समय अम्ब अंदौरा 

अम्ब अंदौरा रेलवे स्टेशन 

अम्ब अंदौरा 

अम्ब अंदौरा 

अम्ब अंदौरा स्टेशन पर मेरे मामाजी 

अम्ब अंदौरा रेलवे स्टेशन 

अम्ब अंडोरा स्टेशन 

मैं भी 

इसी प्लेटफॉर्म पर सोये थे हम रात को 

अम्ब अंदौरा में सूर्योदय 

पनोह रेलवे स्टेशन 

नांगल की एक नहर 

भानुपली रेलवे स्टेशन 

आनंदपुर साहिब रेलवे स्टेशन 

मोरिंडा जंक्शन 

मोहाली स्टेशन 

मोहाली, चंडीगढ़ 





कुरुक्षेत्र जंक्शन 

गीता जयंती एक्सप्रेस 

करनाल  स्टेशन 

सब्जी मंडी से जाती श्री शक्ति एक्सप्रेस 

सब्जी मंडी रेलवे स्टेशन 




धन्यवाद 

Comments

  1. ग़ज़ब हिम्मत भाई सिर्फ 10 मिनट के लिए ट्रेन छूट गयी...रात भर उस ट्रैन में काटना स्टेशन पर परिबार के साथ हिम्मत का काम है....बढ़िया यात्रा भाई

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