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Showing posts from July, 2013

SHYONPUR FORT

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श्योंपुर क़िला 
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      इस गर्मी के माह में भी मुझे बरसात की वजह से काफी ठण्ड का सामना करना पड़ा। श्योपुर स्टेशन से बाहर निकलकर मैंने और दीपक ने एक सिगड़ी के किनारे बैठकर चाय पी। यह काफी अच्छी और मसालेदार चाय थी जिसकी कीमत थी मात्र पाँच रुपये। स्टेशन के ही ठीक सामने एक सड़क जाती है, यह सड़क कुन्नु राष्ट्रीय पार्क की ओर जाती है जो यहाँ से अभी काफी दूर था। समयाभाव के कारण हम वहाँ तक नहीं जा सकते थे। फिर भी हमने एक ऑटो वाले को रोककर पूछा - हाँ भाई यहाँ देखने को क्या है ? वो हमारी बात सुनकर थोडा अचरज में पड़ गया और बोला कि आप श्योपुर घूमने आये हो ? हमने कहा कि हाँ। वो हमारी बात सुनकर काफी खुश हुआ और बोला कि काश आपकी तरह मुझे ऐसे ही रोज पर्यटक मिले तो हमारे साथ साथ इस जिले ( श्योपुर ) का भी नाम दुनिया में मशहूर हो जाए । 

SHYONPUR KALAN

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कुन्नु घाटी की एक रेल यात्रा  - श्योंपुर कलां की ओर 

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      कुन्नु घाटियों का असली नजारा सबलगढ़ के निकलने के बाद ही शुरू होता है। ट्रेन रामपहाड़ी, बिजयपुर रोड,कैमारा कलां होते हुए बीरपुर पहुंची। सबलगढ़ के बाद अगला मुख्य स्टेशन यही है, यहाँ आने से पहले ही  हो गया था, मतलब आसमान में घने काले बादलों की काली घटाएँ छाई हुईं थीं। ट्रेन की छत पर से बादल ऐसे नजर आ रहे थे जैसेकि अभी बरस पड़ेंगे, पर शायद आज बादलों को पता था कि मैं ट्रेन की छत पर और भीगने के सिवाय मुझपर कोई रास्ता ही नहीं बचेगा इसलिए आसमान में गरजते ही रहे। ट्रेन बीरपुर स्टेशन पहुंची, अब बादलों का धैर्य जबाब दे गया था, ट्रेन के स्टेशन पहुँचते ही बरस पड़े, मैं स्टेशन के टीन शैड के नीचे होकर केले खाता रहा, यहाँ केले आगरा की अपेक्षा काफी सस्ते थे और मुझे भूख भी काफी लगी हुई थी, दीपक भी मेरे साथ था। 

SABALGARH

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कुन्नु घाटी में एक रेल यात्रा 

      यूँ तो किसी नई जगह जाने का विचार मन में कई बार आता है पर पूरा कब हो जाए यह तो ईश्वर ही जानता है। मेरे मन में पिछले कई दिनों से ग्वालियर - श्योंपुर नेरो गेज रेल यात्रा का विचार बन रहा था पर साथ के लिए मुझे किसी का सहयोग नहीं मिल रहा था इसलिए विचार, विचार ही बन कर रह जाता था। पर इस बार मेरे मौसेरे भाई दीपक की वजह से मेरा इस रेल यात्रा का सपना पूरा हो गया। कैसे ? आगे जानिये।
     दीपक और दिनेश मेरी मौसी के लड़के हैं और दोनों ही मुझसे छोटे हैं, दोनों ही ग्वालियर में नौकरी करते हैं। कल शाम को ही गाँव से ग्वालियर जाने के लिए आगरा आये थे, मैंने दीपक को इस रेल यात्रा पर चलने के लिए बताया, वह तुरंत चलने के लिए राजी हो गया। मैंने ग्वालियर से श्योंपुर जाने वाली ट्रेन का टाइम देखा सुबह 6:25 था यानी की हमें रात को तीन बजे ही किसी ट्रेन से ग्वालियर के लिए निकलना था, पर नींद का कोई भरोसा नहीं होता, सोते ही रह गए। सुबह आँख भी खुली तो घड़ी पांच बजा चुकी थी, अब तो ट्रेन मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। यह एक मात्र ट्रेन थी जो ग्वालिअर से सुबह चलकर शाम को श्योंपुर …

LUCKNOW

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लखनऊ की एक शाम  इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। 
    हालाँकि मैं पूरी रात का जगा हुआ था सो ऊपर वाली सीट पर सो गया और जब उठा तो देखा ट्रेन लखनऊ शहर में दौड़ रही थी, रास्ते में कुछ स्टेशन पड़े। ट्रेन शाम को 4:30 बजे ट्रेन ऐशबाग स्टेशन पहुंची, मेरा रूहेलखंड एक्सप्रेस से सफ़र यही पर समाप्त हो गया। ट्रेन को अकेला छोड़कर मैं ऐशबाग से चारबाग की ओर चल दिया , और रूहेलखंड एक्सप्रेस खड़ी रही सुबह फिर किसी मेरे जैसे मुसाफिर को ले जाने के लिए कासगंज की ओर।

रूहेलखंड के नज़ारे

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रूहेलखंड के नज़ारे 
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    वैसे तो बरेली को रूहेलखंड ही कहा जाता है, पर असली रूहेलखंड के नज़ारे तो बरेली से आगे ही शुरू होते हैं। एक्सप्रेस अपनी रफ़्तार में दौड़ रही थी, ट्रेन में सभी यात्री रूहेलखंडी थे, उनकी भाषा से मुझे इस बात का आभास हुआ, वाकई उनकी भाषा बड़ी ही मिठास भरी थी। इधर चारों तरफ हरियाली ने मेरा मन मोह लिया था और मौसम भी सुहावना था, हल्की बारिश हो रही थी, तभी एक स्टेशन आया बिजौरिया। बारिश में हरियाली के साथ साथ मौसम ने वक़्त को काफी खुशनुमा बना दिया था। 

बरेली की यात्रा

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 बरेली की यात्रा 
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       सुबह का सफ़र बड़ा ही सुहावना होता है खासतौर पर सूरज निकलने से पहले, यूँ तो गर्मी के दिन थे पर मुझे सर्दी का अनुभव होने लगा था, ट्रेन अपनी रफ़्तार से दौड़ रही थी थोड़ी देर में एक वीराने में स्टेशन आया कासगंज सिटी। यूँ तो स्टेशन का नाम कासगंज सिटी है पर मुझे यहाँ कहीं भी सिटी जैसी कोई चीज़ नजर नहीं आयी, था तो सिर्फ वीराना और खेत खलिहान। ट्रेन एक एक्सप्रेस गाड़ी थी, सो बड़ी स्पीड के साथ स्टेशन से निकली मैं फोटू ही नहीं ले पाया।

रूहेलखंड एक्सप्रेस से एक सफ़र

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कासगंज स्टेशन पर एक रात

    आज मेरा मन मीटर गेज की ट्रेन से यात्रा करने का था सो प्लान बना लिया कि कासगंज से गोंडा के रूट पर  यात्रा की जाए। दिन गुरूवार था, आगरा कैंट से कोलकाता के लिए सुपरफास्ट जाती है कासगंज होकर जो रात 8 बजे कासगंज पहुँच जाती है और कासगंज से 9:15 pm पर बरेली तक जाती है और वहां से सुबह 4 बजे गोंडा के लिए पैसेंजर जाती है। प्लान तो अच्छा था लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, कोलकाता एक्सप्रेस आज चार घंटे लेट हो गई और गोंडा जाने का प्लान ठप्प हो गया। 
     रात बारह बजे कासगंज पहुंचा, सन्नाटा था, प्लेटफोर्म पर यात्री सोये पड़े थे शायद टनकपुर जा रहे थे। या फिर कानपुर की ओर। खैर अपनी मंजिल कुछ और ही थी। गोंडा की तो कोई ट्रेन नहीं थी लेकिन लखनऊ की थी रूहेलखंड एक्सप्रेस जो सुबह पांच बजे चलकर शाम को पांच बजे लखनऊ पहुँच जाती है, यानी बारह घंटे का सफ़र पर बहुत ही मजेदार । कैसे ? आगे जानिये ।