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Showing posts from April, 2012

KUMBHALGARH

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कुम्भलगढ़ और परशुराम महादेव  
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     कल हम हल्दीघाटी घूमकर आये थे, आज हमारा विचार कुम्भलगढ़ जाने की ओर था और ख़ुशी की बात ये थी कि आज धर्मेन्द्र भाई भी हमारे साथ थे। राजनगर से कुम्भलगढ़ करीब पैंतालीस किमी दूर है, भैया ने मेरे लिए एक बाइक का इंतजाम कर दिया।  भैया, भाभी अपने बच्चों के साथ अपनी बाइक पर, जीतू अपनी पत्नी - बच्चों और दिलीप के साथ अपनी बाइक पर और तीसरी बाइक पर मैं और कल्पना थे। 
    पहाड़ी रास्तो से होकर हम कुम्भलगढ़ की तरफ बढ़ते जा रहे थे, मौसम भी काफी सुहावना सा हो गया था , जंगल और ऊँचे नीचे पहाड़ों के इस सफ़र का अलग ही आनंद आ रहा था, मैं बाइक चला रहा था और कल्पना मोबाइल से विडियो बना रही थी। यहाँ काफी दूर तक बाइक बिना पेट्रोल के ही चल रही थी, ढ़लान के रास्तों पर जो करीब तीन किमी लम्बे होते थे ।

HALDIGHATI

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हल्दीघाटी - एक प्रसिद्ध रणभूमि

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   आज हमारा विचार हल्दीघाटी जाने का बना, जीतू ने आज छुटटी ले थी साथ ही एक बाइक का इंतजाम भी कर दिया। मैं ,कल्पना, दिलीप, जीतू और उसका बेटा अभिषेक दो बाइकों से चल दिए एक प्रसिद्ध रणभूमि की तरफ जिसका नाम था हल्दीघाटी। यूँ तो हल्दीघाटी के बारे में हम कक्षा चार से ही पढ़ते आ रहे हैं, और एक कविता भी आज तक याद है जो कुछ इसतरह से थी,                         रण बीच चौकड़ी भर भर कर , चेतक बन गया निराला था।                          महाराणा प्रताप के घोड़े से   , पड़  गया  हवा का पाला था ।।
    हल्दीघाटी के मैदान में आज से पांच सौ वर्ष पूर्व मुग़ल सेना और राजपूत सेना के बीच ऐसा भीषण संग्राम हुआ जिसने हल्दीघाटी को इतिहास में हमेशा के लिए अमर कर दिया और साबित कर दिया कि भारत देश के वीर सपूत केवल इंसान ही नहीं,  जानवर भी कहलाते हैं जो अपनी जान की परवाह किये बगैर अपने मालिक के प्रति सच्ची वफ़ादारी का उदाहरण पेश करते हैं और ऐसा ही एक उदाहरण हल्दीघाटी के मैदान में महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक ने अपनी जान देकर दिया। ऐसे वी…

RAJSAMAND - 2012

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राजसमंद और कांकरोली
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      श्री नाथजी के दर्शन करके हम राजनगर की ओर रवाना हो लिए, दिलीप एक मारुती वन में बैठ गया, मैं ,जीतू और कल्पना बाइक पर ही चल दिए। रात हो चली थी , राष्ट्रीय राजमार्ग - 8  पर आज हम बाइक से सफ़र कर रहे थे, सड़क के दोनों तरफ मार्बल की बड़ी बड़ी दुकाने और गोदाम थे और रास्ता भी बहुत ही शानदार था। थोड़ी देर में हम कांकरोली पहुँच गए, यहाँ हमें दिलीप भी मिल गया और हम फिर जीतू के घर गए , भईया को अभी पता नहीं था कि मैं कांकरोली में आ गया हूँ, मेरा संपर्क सिर्फ जीतू के ही साथ था । जीतू और धर्मेन्द्र भैया मेरे बड़े मामा जी के लड़के हैं। दोनों ही यहाँ मार्बल माइंस में नौकरी करते हैं, इसलिए अपने परिवार को लेकर दोनों यहीं रहते हैं, मैं पहले भी कई बार कांकरोली और राजनगर आ चुका हूँ, कल्पना और दिलीप पहली बार आये थे। 
    दरअसल राजनगर और कांकरोली दो मुख्य बड़े शहर हैं जो एक दुसरे से बिलकुल सटे हुए हैं , कांकरोली से राजनगर तक पूरा एक बड़ा बाजार है। राजसमन्द को ही राजनगर कहते हैं, राजसमन्द एक शहर का नाम न होकर एक जिले का नाम है जिसमे कां…