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BAIJNATH TEMPLE AND BINBA RIVER

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बैजनाथ धाम और बिनबा नदी


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      पिछले भाग में आपने पढ़ा कि मैं काँगड़ा से बैजनाथ पपरोला तक चलने वाली एकमात्र एक्सप्रेस ट्रेन से बैजनाथ पपरोला स्टेशन पहुँच गया। अब यह ट्रेन शाम को यहाँ से 4:30 बजे पठानकोट के लिए प्रस्थान करेगी इसलिए अभी बैजनाथ में घूमने के लिए मेरे पास पर्याप्त समय था। मैं पहले भी यहाँ 2 या 3 बार आ चुका हूँ और जब आज से 6 साल पहले जब मैं यहाँ आया था तब पिताजी के साथ यहाँ बहने वाली बिनवा नदी में स्नान भी करने गया था। इसलिए आज सबसे मेरा लक्ष्य था इस नदी स्नान करना। बैजनाथ से आगे रेलवे लाइन जोगिन्दर नगर तक जाती है और एक शानदार घुमाव साथ बिनवा नदी को पार करती है।

KANGRA EXPRESS

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काँगड़ा वैली एक्सप्रेस से एक सफ़र 


अभी हाल ही में दिनांक 6 फरवरी से काँगड़ा वैली रूट पर एक एक्सप्रेस ट्रेन का संचालन किया गया है। यह काफी लम्बा समय था जब इस 164 किमी लम्बे रूट पर कोई एक्सप्रेस ट्रेन चली है। हालाँकि यह अभी पठानकोट से बैजनाथ पपरोला तक ही अपनी सेवा देती है। परन्तु इस 141 किमी लम्बी यात्रा को एक एक्सप्रेस ट्रेन द्वारा पूरा करना कम रोमांचकारी नहीं है। पठानकोट से चलने के बाद इसका अगला स्टॉप ज्वालामुखी रोड स्टेशन पर है। इस बीच में अनेकों छोटे छोटे स्टेशन आते हैं और जब यह ट्रेन उन स्टेशन पर बिना रुके गुजरती है तो उसके आनंद का एहसास केवल उसे ही हो सकता है जिसने इस ट्रेन में बैठकर यात्रा की हो। 

KUMUD VAN

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कदर वन या कुमुद वन 
यूँ तो ब्रज का एक एक भाग भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं से परिपूर्ण है किन्तु ब्रज में कुछ ऐसे भी स्थान हैं जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसी दिव्य लीलाएँ की हैं जिनसे वह स्थान ब्रज के मुख्य धाम कहलाते हैं, इनमें से ही एक हैं ब्रज के द्वादश वन अर्थात बारह वन।  ब्रज के बारह वन निम्न प्रकार हैं -

मधुवन   तालवन कुमुदवन बहुलावन काम्यवन खदिर वन वृन्दावन भद्रवन भांडीर वन बेलवन लोहवन महावन  इन सभी वनों में भगवान श्रीकृष्ण ने अलग अलग दिव्य लीलाएँ की हैं। बहुलावन की यात्रा मैं पहले ही कर चुका  था इसलिए अब मुझे तलाश थी कुमुदवन की। मैंने सुन रखा था कि कुमुदवन मथुरा से सौंख जाने वाले रास्ते पर कहीं है, मैं कई बार कुमुदवन की तलाश में वहां गया भी, मगर बड़े ही आश्चर्य की बात है भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़े इस स्थान के बारे में ब्रजवासियों को ही नहीं पता था कि उनके आसपास कोई कुमुदवन नाम का स्थान भी है। मैंने कई बार गूगल मैप में इसे खोजने की कोशिश की, परन्तु वहां भी कुमुदवन का कोई जिक्र नहीं था परन्तु मेरा मन नहीं माना, मुझे जितनी असफलताएँ मिलती जा रही थी, उतना ही मेरा कुमुदवन को खोजने वि…

बटेश्वर मंदिर समूह - मध्य प्रदेश

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बटेश्वर मंदिर समूह - मध्य प्रदेश

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विमल के कहे अनुसार अब हम अपने अपने घरों की तरफ बढ़ रहे थे। दोपहर के तीन बज चुके थे और कुछ ही समय बाद शाम होने वाली थी। विमल और लोकेश को आगरा निकलना था और मुझे मथुरा। पढ़ावली से निकलकर पीछे की ओर एक रास्ता जाता है जो बटेश्वर के प्राचीन मंदिर समूह तक पहुंचाता है। यह हमारा आखिरी पड़ाव था जिसके बाद हमें घर के लिए रवाना होना ही था। पढ़ावली से बटेश्वर मंदिर समूह की दूरी केवल 1 किमी है। हम जल्द ही यहाँ पहुँच गए। अपनी बाइक बाहर ही खड़ी करके हम अंदर पहुंचे तो एक खूबसूरत बगीचा हमारे सामने था और उसके सामने था प्राचीन मंदिरों का वो समूह जिसे देखने के लिए ही हम यहाँ इतनी दूर आये थे। 

पढ़ावली - दशवीं शताब्दी का एक खंडित शिव मंदिर

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पढ़ावली - दशवीं शताब्दी का एक खंडित शिव मंदिर 

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     मितावली से ही कुछ दूर ऊँची ऊँची पहाड़ियाँ सी दिखने लगी थीं। किसी ने हमें बताया कि उन पहाड़ियों के उसपार ग्वालियर की सीमा शुरू हो जाती है और मुरैना की समाप्त।  ये सुनते ही विमल मुझपर झर्राया - तू हमें आखिर धीरे धीरे करके ग्वालियर तक ले ही आया, अब बहुत हो चुका अब सीधे घर का रास्ता पकड़ते हैं। मैं जानता था अभी यहाँ बहुत ऐसा है जिसे ढूँढना और देखना बाकी था और मैं किसी भी हालत में इस खोज को अधूरा छोड़कर जाने वाला नहीं था परन्तु अपने दोस्त को विश्वास दिलाना और उसकी चिंता समाप्त करना भी मेरा ही कर्तव्य था, इसलिए मैंने उसे गूगल में हाईवे तक पहुँचने का रास्ता दिखाया जो ठीक उन पहाड़ियों के बराबर से हाईवे तक जा रहा था। घर की तरफ जाने वाले रास्ते को देखकर विमल संतुष्ट हो गया और उसे यकीन हो गया कि हम घर की तरफ ही बढ़ रहे हैं बस रास्ते में जो भी ऐसी जगह मिलेगी उसे देखते हुए जायेंगे। 

चौंसठ योगिनी - इकत्तरसो महादेव मंदिर

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चौंसठ योगिनी - इकत्तरसो महादेव मंदिर 

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      काकनमठ मंदिर की यात्रा करने के बाद अब हमारा अगला लक्ष्य था मुरैना के मितावली स्थित इकत्तरसो महादेव मंदिर को देखना जो चौंसठ योगिनी मंदिर में से एक है तथा इसकी संरचना के आधार पर ही आज हमारे देश की संसद भवन का निर्माण हुआ है। यह मंदिर काकनमठ से दूर पूर्व - दक्षिण दिशा में करीब 20 किमी दूर स्थित है। यहाँ जाने के लिए सबसे पहले हम सिहोनिया वापस लौटे और सिहोनिया से ख़राब से दिखने वाले एक वीरान रास्ते पर चल पड़े। होली का समय था इसलिए रास्तों में आने वाले गाँवों में ग्रामवासी रास्तों में होली खेल रहे थे, इनसे बाल बाल बचते हुए हम अपनी मंजिल  तरफ बढ़ते ही रहे। 

मैं काकनमठ हूँ

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मैं काकनमठ हूँ 


      चम्बल नदी के आसपास के बीहड़ों में प्राचीनकाल से ही मानवों का बसेरा रहा है चाहे ये बीहड़ देखने में कितने  भयावह क्यों ना लगें परन्तु मनुष्य एक ऐसी प्रजाति है जो धरती के  किसी भी भाग में अपने जीवन यापन की राह ढूंढ ही लेता है। सदियों से चम्बल के बीहड़ों में अनेकों सभ्यताओं का जन्म हुआ, अनेकों शासकों ने अपने किले, अपने महल और अपने राज्य यहाँ स्थापित किये और भारतीय इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ने और आने वाली पीढ़ियों को अपने वजूद, अपने काल और अपनी संस्कृति का सन्देश देने के लिए अनेकों मंदिरों, भवनों और इमारतों का निर्माण कराया। इन्हीं वंशों में एक काल था कछवाहा वंश के राजाओं का, जिन्होंने चम्बल के दूसरी तरफ एक विशाल राज्य का निर्माण किया और अनेकों मंदिरों का निर्माण कराया। गुजरते हुए वक़्त के साथ राजा, उनकी सेना और उनका राज्य समाप्त हो गया किन्तु उनके बनवाये हुए मंदिर और इमारतें आज भी उनकी बेजोड़ स्थापत्य कला का उदाहरण बनकर जीवित हैं।